नीति आयोग की बैठक

,

नीति आयोग की संचालन परिषद की बैठक में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जो कुछ कहा, देश चाहेगा वह वाकई साकार हो। उन्होंने कहा कि बीते वित्त वर्ष 2017-18 की चौथी तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था ने 7.7 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की है और अब चुनौती इस वृद्धि दर को दहाई अंक में ले जाने की है। इसके साथ उन्होंने कहा कि वर्ष 2022 तक न्यू इंडिया का सपना अब हमारे देश के लोगों का एक संकल्प है।

नीति आयोग ऐसा मंच है, जिसकी कल्पना प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्रियों यानी केंद्र और राज्यों को देश के विकास के लिए एक टीम के रूप में काम करने के रूप में की गई है। प्रधानमंत्री ने जो कहा उसका अर्थ यही है कि हमें यदि दहाई अंक का विकास दर हासिल करना है और न्यू इंडिया के लक्ष्य को हासिल करना है तो सबको मिलकर काम करना होगा। यानी पूरा देश इसे अपना लक्ष्य माने। यह कैसे हो सकता है?

केवल दहाई अंक हासिल करने से ही न्यू इंडिया का लक्ष्य पूरा नहीं हो सकता। प्रधानमंत्री के अनुसार किसानों की आय को दोगुना करना, विकास की आस में बैठे जिलों का विकास, आयुष्मान भारत, मिशन इंद्रधनुष, पोषण मिशन, स्वच्छता मिशन, कौशल विकास..आदि को साकार कर दिया जाए तो ही न्यू इंडिया का सपना साकार हो सकता है। उन्होंने कहा भी कि संचालन परिषद ऐसा मंच है, जो ‘ऐतिहासिक बदलाव’ ला सकता है।

उनकी बातों से किसी की असहमति नहीं हो सकती है। किंतु क्या देश का राजनीतिक वातावरण ऐसा है, जिसमें वाकई सारे राज्य एवं केंद्र एक टीम के रूप में कंधे-से-कंधा मिलाकर इन लक्ष्यों के लिए काम कर सके? हालांकि प्रधानमंत्री ने यह जरूर कहा कि संचालन परिषद ने राजकाज से जुड़े जटिल मुद्दों को टीम इंडिया के रूप में सहयोगपूर्ण, प्रतिस्पर्धापूण संघवाद की भावना के साथ लिया है लेकिन हमारे देश का पूरा सच यह नहीं है। चुनावी राजनीति ने ऐसा वातावरण बना दिया है, जहां विकास एवं सुरक्षा तक के मुद्दों पर आम सहमति नहीं बन पाती।

ज्यादातर राज्य अपनी राजनीतिक सुविधा के अनुसार केंद्र की नीतियों को स्वीकार या अस्वीकार करते हैं। मसलन आयुष्मान योजना को कई राज्यों ने स्वीकार नहीं किया। फसल बीमा योजना को कई राज्यों ने खारिज कर दिया। वास्तव में जब तक देशहित को ध्यान में रखते हुए केंद्र एवं राज्यों के बीच सहयोग नहीं होगा तो फिर न्यू इंडिया का लक्ष्य पाना संभव नहीं होगा।