निंदनीय विरोध

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ब्रिटेन यात्रा के दौरान विरोध के नाम पर जो कुछ हुआ वह हर दृष्टि से निन्दनीय है। 53 राष्ट्रमंडल देशों में से हमारे तिरंगे को फाड़ दिए जाने को सहन नहीं किया जा सकता। ये कौन लोग थे? कहा जा रहा है कि खालिस्तान समर्थक भी प्रदर्शनकारियों में शामिल थे। अभी यह पता करना मुश्किल है किसने ऐसा किया लेकिन जो भी होगा उसे भारत विरोधी ही कहा जा सकता है। लोकतांत्रिक राजनीति में विरोध प्रदर्शन सामान्य बात है। लेकिन देश के बाहर विदेश की धरती पर ऐसा करने के पहले सौ बार सोचा जाना चाहिए।

नरेन्द्र मोदी का आप विरोध करते हैं करिए, लेकिन वे ब्रिटेन में भारत के प्रधानमंत्री की हैसियत से देश का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। भारत में अभी ऐसा कुछ नहीं हुआ है, जिसके लिए विदेश जाकर विरोध करके उनके प्रतिकूल संदेश दिया जाए। मोदी सरकार की कुछ नीतियों से असहमति हो सकती है, लेकिन देश सामान्य लोकतांत्रिक तरीके से चल रहा है। जब आप विदेश की धरती पर सरकार द्वारा दलितों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं पर अत्याचार की बात करते हैं तो इससे देश की छवि खराब होती है। लगता है जैसे भारत में ऐसा कोई अत्याचारी शासन आ गया है, जहां कुछ वर्ग विशेष का जीना मुहाल हो गया है।

यह स्थिति कतई नहीं है। फिर इसमें खतरा भी है। आपके विरोध में यदि खालिस्तान समर्थक या अन्य भारत के टुकड़े करने की मंशा रखने वाले शामिल हो जाते हैं और कुछ ऐसा कर गुजरते हैं, जो नहीं किया जाना चाहिए तो उसकी जिम्मेवारी भी आपके सिर ही आएगी। आप आग लगाने के बाद यह नहीं कह सकते कि हमने फलां घर जलाने की योजना नहीं बनाई थी। इसलिए भारत का तिरंगा फाड़ने का आरोप भी उन्हीं के सिर आएगा जो वहां प्रधानमंत्री के विरु द्ध प्रदर्शन कर रहे थे। हालांकि इन विरोधियों को भी वहां बाद में विरोध का सामना करना पड़ा और तिरंगा फाड़े जाने के बाद तो स्थिति हिंसक हो गई थी।

प्रधानमंत्री की यात्रा के बीच कुछ लोग गड़बड़ी की कोशिश कर सकते हैं, इस चिंता से ब्रिटिश अधिकारियों को अवगत कराया गया था। जाहिर है, उन्हें जितना सतर्क होना चाहिए नहीं थे। हालांकि संबंधित ब्रिटिश अधिकारी द्वारा क्षमा मांगने की भी सूचना है, लेकिन यह खबर तो दुनिया भर में फैल ही गई कि प्रधानमंत्री की उपस्थिति में वहां 53 देशों के बीच केवल भारत का तिरंगा ही फाड़ा गया।