नहीं बचेंगे भगोड़े

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भगोड़ा आर्थिक अपराधी विधेयक, 2018 संसद द्वारा पारित किया जाना निश्चय ही महत्वपूर्ण है। बैंकों को करोड़ों की चपत लगाकर विदेश भागने वालों को लेकर देश में काफी समय से हंगामा मचा हुआ है। हालांकि ऐसे कानून पहले से हैं, जिनसे ऐसे लोगों से धन वसूलने के लिए कार्रवाई की जा सकती हैं। पर ये पर्याप्त नहीं हैं। आज की स्थिति में जब ऐसे लोगों की संख्या बढ़ रही है, जो बैंकों की पहुंच एवं न्यायालयों के कार्यक्षेत्र से बाहर भाग रहे हैं, इसके लिए विशिष्ट कानून की आवश्यकता महसूस की जा रही थी।

मोदी सरकार ने पहले इसे अध्यादेश के रूप में क्रियान्वित किया और अब संसद के दोनों सदनों से पारित करा लिया। जो माहौल है, उसमें कोई पार्टी इसका विरोध कर नहीं सकती थी। इसके पारित होने पर कोई संदेह नहीं था। इसका मूल उद्देश्य ऐसे वित्तीय अपराधियों को वापस लाकर सजा देना, बैंकों की राशि वसूलना तथा संभावित भगोड़ों को रोकना है। दोनों प्रकार के प्रावधान इसमें हैं। इसके बाद मामला सामने आने के साथ ही ऐसे ज्यादातर आरोपियों को देश से बाहर जाने से रोका जा सकता है। कानून के अमल में आने के साथ न केवल ऐसे भगोड़ों की संपत्ति जब्त होगी बल्कि उन्हें स्वदेश लाना आसान होगा।

भगोड़ों की अनुपस्थिति के कारण न्यायालयों के लिए भी समस्या हो जाती है। कहने की जरूरत नहीं कि जब आरोपी उपस्थित ही नहीं होगा तो उसकी जांच सही तरीके से नहीं हो सकती। न्यायिक प्रक्रिया में बाधा पैदा होती है तथा न्यायालय का मूल्यवान समय बरबाद होता है। बैंकों से भारी राशि निकल जाने के कारण उनकी वित्तीय हालत भी खराब होती है।

अब कानून की ताकत हाथ में आने के बाद जांच एजेंसियों के लिए काम करना आसान हो जाएगा। अब आरोपियों की संपत्ति आसानी से जब्त हो सकती है। ऐसे अपराधी जिनने दूसरे देश की नागरिकता ले ली है, उनको वापस लाना आसान नहीं होता। एक भगोड़ा मेहुल चौकसी के बारे में सूचना आ रही है कि उसने एंटीगुआ की नागरिकता ले ली है।

जाहिर है, उसे वापस लाने में समस्याएं तो आएंगी किंतु कानून के प्रारूप को उस देश के अधिकारियों के सामने रख कर यह बताया जा सकता है कि इस पर जो आरोप हैं, उनके लिए न्यायालय को इसकी आवश्यकता है। वैसे भी, कानूनों का एक भयनिवारक प्रभाव होता है। ऐसे कानून भी वित्तीय गबन करके विदेश भागने की मंशा रखने वालों को भयभीत करेंगे कि हमें चाहे जहां चले जाएं, हमारी खैर नहीं।