नवाज शरीफ : कबूलनामे का फायदा!

डॉ. रहीस सिंह,

जैसे जैसे समय बीत रहा है वैसे-वैसे पाकिस्तान की जम्हूरियत के इम्तेहान की घड़ी की सुइयां तेजी से आवाज के साथ घूमती नजर आ रही हैं। पाकिस्तान के लोगों में उम्मीद तो कायम है कि जम्हूरियत बची रहेगी लेकिन यह संशय भी है कि सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई मिल कर पता नहीं क्या ‘गेम प्लान’ कर रहे हों।  तथ्य है कि आर्मी और खुफिया एजेंसी, जिनके संयुक्त अनधिकृत ढांचे के लिए डीप स्टेट शब्द का प्रयोग किया जाता है, अपने प्यादे तलाश रहे हैं, और इमरान खान जैसे कच्चे-पक्के खिलाड़ी इस निष्कर्ष पर पहुंच रहे हैं कि वे ही असली सिपहसालार (सही अथरे में प्यादे) हैं। ऐसे में नवाज शरीफ के ‘द डॉन’ में साक्षात्कार, जिसमें कबूल किया गया है कि मुंबई हमले में पाकिस्तान का हाथ था, ने पाकिस्तानी सियासत की दिशा ही मोड़ दी। अब पाकिस्तानी सियासत का ऊंट किस करवट बैठेगा, यह पता नहीं लेकिन यह विचारने की जरूरत अवश्य है कि नवाज ने यह पत्ता फेंका क्यों? क्या सेना-आईएसआई-कट्टरपंथ की तिकड़ी को दुनिया के सामने लाने की चाल चलकर अपने ऊपर निरंतर पड़ रहे दबावों को कमजोर करना चाहते हैं, या वजह कोई और है? सवाल यह भी कि क्या भारत को इससे कोई लाभ होगा?

शुक्रवार को अपने और अपने परिवार के खिलाफ एकाउंटबिलिटी प्रक्रिया के कारण पूर्व प्रधानमंत्री और पीएमएल-एन सुप्रीमो नवाज ने मुल्तान रैली से पहले पाकिस्तानी अखबार ‘द डॉन’ को दिए साक्षात्कार में कई बातों को सामने रखा। इनमें 26/11 की घटना में पाकिस्तान का हाथ होने संबंधी विषय भी शामिल है। सबसे पहले तो उन्होंने कहा कि यदि तो दो या तीन समानांतर सरकारें हैं, तो आप देश नहीं चला सकते। कहा कि उन्होंने पार्टी नहीं छोड़ी, बल्कि उन्हें  उससे बेदखल किया गया। बेदखल किसने किया? उनका इशारा सेना (शायद न्यायपालिका भी) की तरफ था। कहा कि कई बार समझौते करने के बाद भी मेरे विचारों को स्वीकारा ही नहीं गया। अफगानिस्तान के नैरेटिव को मान लिया जाता है, लेकिन हमारे नहीं। नवाज ने इस बात को नकार दिया कि नाकाम रहने के चलते उन्हें पद से जाना पड़ा। कहा कि देश में संविधान सबसे ऊपर है। दूसरा कोई रास्ता नहीं है। हमने एक तानाशाह (परवेज मुशर्रफ) पर केस चला दिया। ऐसा पाकिस्तान में पहले कभी नहीं देखा गया था। इसी क्रम में उन्होंने वर्ष 2013 से 2017 तक उनके द्वारा शुरू की गई परियोजनाओं को एनीमेट करते हुए पाकिस्तान में राजनीति, विधिक और आर्थिक सुधारों पर अपनी आलोचना को अस्वीकार करते हुए सवाल किया कि पहले वर्ष से ही अस्थिरता को प्रोत्साहन दिया गया हो तो फिर सुधार कैसे किया जा सकता है। सार्वजनिक पद से हटाने के मामले में उत्तर देते हुए नवाज ने विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए इसे अपने बलिदान आधारित नैरेटिव के रूप में पेश किया। कहा कि पाकिस्तान में आतंकवादी संगठन सक्रिय हैं। उन्हें नॉन-स्टेट एक्टर्स कह सकते हैं। उनका कहना था कि नॉन स्टेट एक्टर्स को सीमा पार जाने और मुंबई के 150 लोगों की हत्या करने की छूट क्यों दी जानी चाहिए थी? मुझे स्पष्ट करें। रावलपिंडी के एंटी टेररिज्म कोर्ट में मुंबई हमले से जुड़े मुकदमे के लंबन का संदर्भ देते हुए उनका कहना था कि अभी तक ट्रॉयल पूरा क्यों नहीं किया जा सका? हम तो पूरा केस भी नहीं चलने देते।

सवाल उठता है कि नवाज ने सत्ता से बेदखल होने के लगभग 9 माह बाद यह बात क्यों स्वीकार की? हालांकि नवाज की स्वीकारोक्ति से भारत को कोई बड़ा फायदा होने वाला नहीं है क्योंकि अब वह एस्टैब्लिशमेंट से बाहर और कुछ हद तक उसके खिलाफ हैं। दूसरी बात यह कि इस सच को तो दुनिया जानती है, फिर अब तक हमने इस मोच्रे पर कौन-सी बाजी मार ली है, या दुनिया को पाकिस्तान के खिलाफ करने या अपने पाले में खींचने में कौन-सी सफलता अर्जित कर ली है। क्या इसके बाद चीन का नजरिया मसूद अजहर जैसे लोगों के प्रति बदल जाएगा या तमाम देश उसके खिलाफ खड़े हो जाएंगे या पाकिस्तान का एंटी टेररिज्म कोर्ट दबाव में आकर ट्रायल पूरा कर आतंकियों को सजा सुना देगा। ये सब हमारे छद्म प्रसन्नता के पक्ष हैं, और कुछ नहीं। हां, नवाज ने इसके जरिए एक गेम जरूर खेल दी है।  पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने एकाउंटबिलिटी मामले में न्यायिक प्रक्रिया से परे जाकर सजा सुनाई क्योंकि सुनवाई पूर्ण होने से पहले सुजा सुनाना प्राकृतिक न्याय की श्रेणी में नहीं आता। दूसरी बात यह कि पार्टी अध्यक्ष का पद कौन-सा संवैधानिक पद था, जिससे भी उन्हें बेदखल किया गया। ध्यान रहे कि नवाज सेना को वैसे भी बहुत ज्यादा पसंद नहीं थे क्योंकि मुशर्रफ रेजीम के अफसर उन्हें  हजम नहीं कर पा रहे थे। दूसरे वे नरेन्द्र मोदी की ओथ डिप्लोमेसी का हिस्सा बने, उन्होंने उफा में आतंकियों के वॉयस सैम्पल देने की हामी भरी..आदि। जो बात सेना को सबसे ज्यादा अखरी, वह थी सर्जिकल स्ट्राइक और उसका प्रचारवादी पक्ष। यहीं से नवाज का काउंट डाउन शुरू हो गया। इसके लिए गेम प्लान किया सेना ने, मोहरा बने इमरान खान व अन्य और रेफरी का काम किया कोर्ट ने।  

नवाज ने बयान देकर सही अथरे में किसे कठघरे में खड़ा किया? स्वाभाविक रूप से सेना और आईएसआई को। इमरान और उनकी पार्टी भी इस दायरे में आ गई जो शुरू से ही जमात-उद-दावा सहित कई कट्टरपंथी संगठनों का सिज़दा कर रही है। शायद नवाज को लगा रहा हो कि इसके बाद अमेरिकी प्रशासन उनके प्रति प्रोटेक्टिव कॉर्नर निर्मित करे। संभव है कि चीन भी उनका साथ दे। ऐसा हुआ तो नवाज सेना से सौदेबाजी करने की स्थिति में आ जाएंगे, जिसका लाभ उन्हें चुनाव में मिल सकता है। बहरहाल, नवाज का बयान निखालिस सियासी है, इसे नैतिक या भारतपरस्ती के दायरे में लाकर देखना शायद गलत होगा। सच तो यह है कि उन्होंने एक तीर से दो निशाने साधे हैं।
पहला, डीप स्टेट और उनके प्रशस्तिकरों के खिलाफ और दूसरा दुनिया को बताकर वैश्विक समर्थन हासिल करने के लिए वे पाकिस्तान में बढ़ती आंतकी सक्रियता से चिंतित हैं। फिलहाल पाकिस्तान की सेना की सेहत पर कोई असर पड़ने वाला नहीं लेकिन नवाज भी ‘टेस्ट टय़ूब बेबी ऑफ जिया उल हक’ हैं, इसलिए सियासी पैंतरों के साथ पाकिस्तानी एस्टैब्लिशमेंट की संरचनात्मक कमजोरी को समझते हैं। हो सकता है कि वे कुछ हद तक सेना और इमरान खान के बीच हुई मैच फिक्सिंग को बेपर्दा करके कुछ लाभांश हासिल कर ले जाएं।