नवरात्र : शक्ति-संचय की साधना

पूनम नेगी,

भारत के सांस्कृतिक पवरे में सबसे ज्यादा लोकप्रिय है नवरात्र। नवरात्र काल में हमारा उत्सवप्रिय राष्ट्र आस्था के अनूठे रंग में डूबा नजर आता है। जगतजननी मां दुर्गा की आराधना का यह उत्सव तमाम क्षेत्रीय विशिष्टताओं के साथ समूचे देश में बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। इस अवधि में जहां एक ओर उत्तर भारत व उत्तराखंड में रामलीलाओं की धूम दिखती है, वहीं दूसरी ओर पश्चिमी बंगाल में महिषासुरमर्दिनी के पूजन की। गुजरात में गरबा उत्सव और मैसूर व कुल्लू में दशहरा उत्सव के अनोखे रंग भी देखने वाले होते हैं। कहीं भव्य पूजा पंडालों की रौनक, कहीं सप्तशती पाठ के आयोजन, कहीं मानस के पारायण पाठ तो कहीं भागवत सप्ताह। देवी मां के मंदिरों में लगने वाले जयकारे भी एक दिव्य माहौल का सृजन करते दिखते हैं।
 हिन्दू दर्शन में नवरात्र काल को शक्ति संचय की दृष्टि से अति विशिष्ट माना जाता है। इन नौ दिनों में भगवती दुर्गा के विविध रूपों की आराधना पुरुषार्थ साधिका देवी के रूप में की जाती है। सर्वप्रथम श्रीराम ने रावण से युद्ध के पूर्व नवरात्र काल में मां शक्ति की आराधना की थी और देवी ने उन्हें ‘विजयश्री’ का वरदान दिया था। कहते हैं देवी की आराधना रावण ने भी की थी पर देवी से उसको ‘कल्याणमस्तु’ की आशीष मिली। यह प्रसंग हिन्दू दर्शन के उस उत्कृष्ट चिंतन का परिचायक है जो बताती है कि शक्ति उसी को फलित होती है, जो सत्य, न्याय व मर्यादा का पक्षधर होता है। देवी मां ने रावण को ‘कल्याणमस्तु’ का आशीर्वाद इसलिए दिया क्योंकि उसके विनाश में ही धरती का कल्याण निहित था। सनद रहे कि मातृ सत्तात्मक समाज हमारी आर्य संस्कृति की अनूठी विशिष्टता है। भारत की यशस्वी संस्कृति स्त्री को विभिन्न रूपों में मान देती है। वह जन्मदात्री मां  के रूप में पोषक है, पत्नी के रूप में गृहलक्ष्मी तथा बहन व बेटी के रूप में घर की रौनक। प्रत्येक स्वरूप रूप में उसका अपना ही महत्त्व है।
हमारे यहां ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:’ कह कर नारी को देवी का मान दिया गया है। देवी दुर्गा वस्तुत: स्त्री शक्ति की अपरिमितता की द्योतक हैं। हमारे ऋषियों ने आदिशक्ति की इसी गौरव गरिमा को समाज में प्रतिष्ठित करने के लिए ऋतु परिवर्तन की बेला में नवरात्र साधना का विधान बनाया था। वैदिक चिंतन कहता है कि मां आदिशक्ति ही विविध अंश रूपों में सभी देवशक्तियों में विराजमान हैं। उनके बिना समस्त देवशक्तियां अपूर्ण हैं। शक्ति यानी भयमुक्ति। शक्ति उपासना के इस विशिष्ट साधनाकाल में साधक आदि शक्ति की उपासना के साथ विभिन्न रूपों नारी शक्ति की गरिमा को साकार रूप देते हैं। श्रीमद्देवी भागवत के ‘दुर्गा सप्तशती’ अंश में भगवती दुर्गा की अभ्यर्थना पुरुषार्थ साधिका देवी के रूप में की गयी है। सप्तशती के 13 अध्यायों में इन्हीं महाशक्ति के द्वारा आसुरी शक्तियों के विनाश की कथा विस्तार वर्णित है, जिसके पीछे शक्ति की महत्ता का दिव्य तत्व दर्शन निहित है। महिषासुर पाशविक प्रवृत्तियों का प्रतीक है। कथा का तत्वदर्शन है कि जब भी समाज पाशविक प्रवृत्तियां सिर उठाती हैं, तब संसार में हाहाकार मच जाता है। दुर्भाग्यवश आज हमारा समाज अपनी गौरवशाली भारतीय संस्कृति के उज्ज्वल जीवनमूल्यों को भुलाता जा रहा है। यही वजह है कि अनाचार, दुराचार, कदाचार व भ्रष्टाचार जैसे असुर चहुंओर अपना शिंकजा फैलाए हुए हैं। यह विडम्बना नहीं तो और क्या है कि हमारे मातृपूजक राष्ट्र की मातृशक्ति ही आज घोर असुरक्षित है।  
तमाम कानून बनने के बाद भी दुष्कर्म की घटनाएं लगातार जारी हैं। कभी सोचा है हमने कि जैसे-जैसे हमारा समाज अधिक शिक्षित और प्रगतिशील होता जा रहा है, वैसे-वैसे ही समाज में महिलाओं के यौन उत्पीड़न के मामले बढ़ रहे हैं। हाल के दिनों में नाबालिग बच्चियों (कन्याओं) के साथ दुष्कर्म के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी होना गम्भीर चिंता का विषय है। परन्तु क्या हम वाकई चिंतित हैं, यह प्रश्न उससे भी बड़ा है। अध्यात्मवेत्ताओं का मानना है कि इन कुत्सित अपराधों का मूल कारण है, हमारा हमारी जड़ों से कटते जाना, अपने सांस्कृतिक जीवनमूल्यों को दरकिनार कर पश्चिम की नितांत भोगवादी संस्कृति व बाजार के मायाजाल में फंसना। भारतीय मनीषा देखती है कि समाज में पशु प्रवृत्तियां तभी प्रबल होती हैं, जब मानव समाज में सात्विकता व नैतिकता का हृास हो जाता है और व्यक्ति अपने कर्तव्य से च्युत होकर भोग विलास, स्वार्थ एवं अधिकार मद के कारण विवेक शून्य हो जाता है। यही वजह है कि मात्र कड़े कानून बना देने से ही इस प्रकार की घटनाओं पर रोक लग पाना सम्भव नहीं है। इसके लिये समाज को भी नैतिक रूप से सजग होना पड़ेगा।