नरम-गरम हिन्दुत्व

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निसंदेह कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी को धर्मनिरपेक्ष प्रेरित राजनीति विरासत में मिली है। आजादी की लड़ाई ही नहीं, उसके बाद भी सत्ता में रहते हुए उसने समाज के हर वर्ग, हर जाति और हर संप्रदाय को साथ लेकर राष्ट्र के पुनर्निर्माण में अपना महती योगदान दिया है। इसलिए यदि राहुल यह कहते हैं कि वह किसी भी तरह के हिन्दुत्व में विश्वास नहीं रखते, चाहे वह नरम हिन्दुत्व हो या फिर कट्टर हिन्दुत्व तो इस पर न तो किसी को हैरत होनी चाहिए और न किसी को आपत्ति। इतना जरूर है कि धर्मनिरपेक्षता की राह पर चलते हुए कांग्रेस ने अपना संतुलन खोया है और समाज के अल्पसंख्यक तबकों और खासकर मुसलमानों को जरूरत से ज्यादा संरक्षण देने की कोशिशें भी की है।

यही वजह है कि भाजपा उस पर मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति करने का आरोप लगाती रही है। कांग्रेस के पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह जब यह कहते हैं कि देश के संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यकों का है, तब कांग्रेस पर लगने वाले मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप की पुष्टि स्वत: हो जाती है। लेकिन यहां यह समझने की जरूरत है कि हिन्दुत्व प्रेरित राजनीति करने वाली भाजपा का यह राजनीतिक दबाव रहा है जिसके कारण कांग्रेस को धर्मनिरपेक्षता की पारंपरिक लाइन से विचलित होकर कभी नरम हिन्दुत्व या मुस्लिम तुष्टिकरण की लाइन पर चलने के लिए बाध्य होना पड़ा है।

अयोध्या में स्थित विवादित रामजन्म भूमि-बाबरी स्थल का ताला खुलवाने से लेकर हिन्दू संगठनों और भाजपा द्वारा शिलान्यास के दौरान कांग्रेस की जो दुविधा दिखाई दी थी, उसकी वजह भी भाजपा की आक्रामक हिन्दुत्ववादी राजनीति ही थी। इसी राजनीतिक दुविधा के कारण पिछले गुजरात चुनाव के दौरान राहुल गांधी पर सवाल खड़े हुए थे, जब उन्होंने सोमनाथ मंदिर में जाकर मत्था टेका था। कांग्रेस पार्टी को बचाव में उतरना पड़ा था और पार्टी की ओर से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को जनेऊधारी ब्राह्मण बताया गया।

जाहिर है इससे कांग्रेस पार्टी की छवि पर बुरा असर पड़ा। इसलिए कांग्रेस के वर्तमान नेतृत्व को ऐसे मध्यमार्गी वैचारिक राजनीतिक लाइन खींचनी चाहिए जो सबको साथ लेकर चले और उस पर न तो मुस्लिम तुष्टिकरण और न ही हिन्दुत्ववादी राजनीति करने का आरोप लगे। हालांकि यह काम कठिन है और यह राहुल के बदलते बयानों से भी जाहिर होता है। पर देश इस मसले पर उनकी बेबाक और स्थिर राय चाहता है।