नमो मंत्र से आस

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सत्ता संभालने के करीब एक साल बाद अप्रैल 2015 में नई दिल्ली में अंबेडकर अंतरराष्ट्रीय केंद्र की आधारशिला रखकर यह संदेश दे दिया था कि भाजपा अब दलितों को और नजदीक लाएगी।

इस महती जिम्मेदारी को स्वयं के कंधों पर उठाया और केवल दलितों के मसीहा के रूप में पूजे जाने वाले गत सहस्रब्दी के ऐतिहासिक पुरुष डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर समूचे हिन्दुओं और समूचे भारतीयों के मसीहा के रूप में प्रस्तुत करने के लिए लगभग एक साल का लंबा अभियान चलाया। इस एक साल में उन्होंने दलितों तक अपनी पहुंच बनाने के लिए दस महत्त्वपूर्ण कदम उठाए। बावजूद इसके उनके द्वारा उठाए गए कदम दलितों के मुक्ति आंदोलन के लिए प्रासंगिक नहीं बन पाए।

आखिर इसकी वजह क्या है? इसे समझना भी आवश्यक है। दरअसल, प्रधानमंत्री मोदी जिस राजनीतिक दल का प्रतिनिधित्व करते हैं, उसका वैचारिक आधार हिन्दू धर्म की मूल आस्थाएं हैं। अर्थात भाजपा की वैचारिकी-सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में हिन्दू धर्म, हिन्दू राष्ट्र, हिन्दी, हिन्दुत्व और वृहत्तर भारत समाहित है। यह विडंबना भी है और भाजपा का अंतर्विरोध भी कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की यह अवधारणा दलित हितों की पोषक नहीं है।

अलबत्ता, प्रधानमंत्री मोदी का भाजपा के साथ दलितों को और अधिक नजदीक लाने की कवायद जमीन पर उतर नहीं पाई। भाजपा के इसी अंतर्विरोध के कारण उसके अपने शासित राज्य गुजरात के उना में कथित गोरक्षकों ने दलित युवकों पर गोवध का कथित आरोप लगाकर अमानवीय अत्याचार किया।

दलित शोध छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या एक बड़े राजनीतिक विवाद के तौर पर सामने आई, जिसके चलते भाजपा का दलितों को रिझाने के अभियान को धक्का पहुंचा। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के एससी-एसटी एक्ट को शिथिल करने के बाद देश भर में भाजपा के खिलाफ दलितों का जो आक्रोश उभरा है, उससे भाजपा बैकफुट पर है। इस चुनावी वर्ष में भाजपा को इस बात का डर सता रहा है कि दलित उससे छिटक सकते हैं। इसलिए भाजपा ने डैमेज कंट्रोल करने के लिए आगामी 14 अप्रैल को बड़े पैमाने पर अम्बेडकर जयंती मनाने का फैसला किया है।

चूंकि किसी भी राजनीतिक दल में दलितों की स्थिति भाजपा से बेहतर नहीं है, इसलिए भाजपा के खिलाफ दलितों का जो आक्रोश दिखाई दे रहा है, उससे पार्टी के राजनीतिक स्वास्थ्य पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा।