नकदी संकट

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नकदी की कमी की जो खबरें देश भर से आ रही हैं, वो नोटबंदी की याद दिलाने वाली हैं। उस दौरान नकदी के लिए हाहाकार मचा रहता था। इस समय एकदम से देश स्तर पर वैसी स्थिति न हो, पर कुछ जगह काफी गंभीर दिखाई दे रही है। हालांकि वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा है कि नकदी की कमी नहीं है, भारतीय रिजर्व बैंक भी यही कह रहा है, पर जिन्हें समस्या का सामना करना पड़ रहा है, उनके लिए ये बयान बेमानी हैं।

सूचना यह भी है कि नोटों की छपाई का काम तेज कर दिया है, और दो की जगह तीन पारियों में काम हो रहा है। यह भी सच है कि नोटबंदी के समय बाजार में जितनी नकदी थी, इस समय उससे ज्यादा है। बावजूद इसके इस तरह का संकट पैदा हुआ है, तो इसका कुछ कारण होना चाहिए। हम भी मानते हैं कि यह संकट लंबा नहीं रहने वाला किंतु ऐसा हुआ क्यों इस पर तो विचार होना ही चाहिए।

कई जगहों से खबर है कि औसत से कई गुणा ज्यादा निकासी हो रही है। यही नहीं, निकासी और जमा करने के अनुपात में भी असंतुलन देखा गया है यानी बैंकों में जमा करने का अनुपात काफी गिरा है। तो क्यों? ऐसा तो नहीं कि नोटबंदी के समय त्रस्त लोगों का एक वर्ग अपने घर में पर्याप्त नकदी रख रहा हो। जिनके कारोबार नकदी पर निर्भर हैं, उनके लिए यह जरूरी भी है।

वो कोई जोखिम मोल लेना न चाहते हों। हाल में अफवाह भी उड़ी कि फाइनैंशल रिजोल्यूशन एंड डिपोजिट इंश्योरेंस या एफआरडीआई विधेयक के कानून बनने के बाद बैंकों में जमा रकम सुरक्षित नहीं रह जाएगी। यद्यपि इसका खंडन किया जा चुका है, लेकिन लगता है कि लोग इससे आश्वस्त नहीं हो रहे। सरकार ने 500 और 1000 के नोटों को वापस करके 500 व 2000 के नोट बाजार में उतार दिए। 2000 का नोट काला धन वालों के लिए ज्यादा मुफीद है। संभव है पिछले कुछ समय में 2000 के नोटों की जमाखोरी भी हुई हो।

ये नोट आम आदमी के लिए समस्या हैं, क्योंकि इनको तुड़वाना कठिन होता है, किंतु जिनको ज्यादा से ज्यादा नकदी छिपानी हो उनके लिए ये सुविधाजनक हैं। सरकार ने हालांकि इनकी छपाई कम कर दी है, और 500 की संख्या बढ़ा दी है। उम्मीद की जानी चाहिए कि नकदी का संकट जल्द दूर हो जाएगा। बहरहाल, सरकार को इसके कारणों पर गंभीरता से विमर्श कर संकट को दूर करने के लिए कदम उठाने चाहिए। जो भी अफवाह भविष्य को लेकर उड़ रही हैं, उनके बारे में बार-बार स्पष्टीकरण दिया जाए अन्यथा ऐसा संकट फिर उभर सकता है।