नई दिशाएं

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पांच दिवसीय यूरोपीय दौरे के दूसरे चरण में लंदन पहुंचे हैं। यहां वह राष्ट्रमंडल देशों के शासनाध्यक्षों के शिखर सम्मेलन में शिरकत करेंगे। लेकिन इस सम्मेलन से ठीक पहले यानी बुधवार को ब्रिटिश समकक्ष टेरिजा मे के साथ उनकी महत्वपूर्ण द्विपक्षीय वार्ता हुई। भारत और ब्रिटेन, दोनों लंबे अरसे से वैश्विक आतंकवाद से जूझ रहे हैं।

लिहाजा, आतंकवाद से निर्णायक लड़ाई दोनों की आपसी बातचीत के एजेंडे पर सबसे ऊपर रही। दोनों प्रधानमंत्रियों ने लश्कर ए तैयबा और जैश ए मोहम्मद जैसे वैश्विक आतंकी संगठनों के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई के लिए सहयोग बढ़ाने का संकल्प लिया। दरअसल, इस सहमति के जरिए आतंकवाद के मसले पर पाकिस्तान को घेरना भारत का मकसद रहा है। दोनों देशों की आपसी बातचीत का मुद्दा ब्रेक्जिट (यूरोपीय संघ से अलग होने का इंग्लैंड का निर्णय) भी रहा। दरअसल, यूरोपीय संघ से ब्रिटेन के अलग होने के बाद वहां कार्यरत भारतीय कंपनियों को नई परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है।

अलबत्ता, दोनों नेताओं ने ब्रेक्जिट के बाद के हालात पर भी चर्चा की। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने ब्रिटिश समकक्ष को आस्त किया कि यूरोपीय संघ से अलग होने के बाद भी भारत के लिए ब्रिटेन का महत्व बना रहेगा। प्रधानमंत्री मोदी की इस यात्रा के दौरान लंदन स्थित वेस्टमिंस्टर में आयोजित भारत की बात, सबके साथ कार्यक्रम भी सुर्खियों में रहा। इस कार्यक्रम में उन्होंने पाकिस्तान को कड़ी चेतावनी देने के साथ ही देश की घरेलू नीतियों पर भी अपने विचारों को स्पष्ट किया। पाकिस्तान के संदर्भ में उन्होंने कहा कि भारत संयम बरतेगा लेकिन जब पीठ पर कोई वार करेगा तो हम उसी भाषा में जवाब देने से पीछे नहीं हटेंगे।

उनका यह विचार भारत की विदेश नीति को पुनर्परिभाषित करने वाला है। हम पहले पंचशील और गुटनिरपेक्षता जैसे आदर्शवादी तत्वों के साथ अपनी विदेश नीति को संचालित करते थे। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी का यह बयान बताता है कि अब भारत व्यवहारवाद की ओर मुड़ रहा है। व्यवहारवाद का अर्थ उन नीतियों से है, जो राष्ट्रीय हितों को बढ़ावा देती हैं।

इस लिहाज से हम कह सकते हैं कि भारत की विदेश नीति अब अस्मिता के आग्रह के साथ प्रकट हो रही है, और आगे बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि कठुआ और उन्नाव जैसी घटनाएं शर्मसार करती हैं, लेकिन दुख तब होता है जब इनको राजनीतिक मुद्दा बनाया जाता है।