धूल की चादर

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प्रदूषण ने दिल्ली-एनसीआर वालों का चैन छिन रखा है। मंगलवार को धूल भरी आंधी के चलते एक बार फिर राजधानी दिल्ली और आसपास के इलाके प्रदूषण के चलते परेशान रहे। राजस्थान और उत्तरी पश्चिमी हवा के साथ उड़कर आई धूल की चपेट में यहां के लोग एक तरह से बंधक बने रहे। विशेषज्ञों की मानें तो पश्चिम की तरफ सूखी और बंजर जमीन से धूल भरी आंधी पहुंचती है और आसपास के राज्यों को गिरफ्त में ले लेती है। क्या प्रदूषण की ऐसी मार दिल्ली-एनसीआर की जनता इसी तरह सहती रहेगी? क्या कोई उपाय ऐसी जानलेवा समस्या को खत्म नहीं कर सकती है?

भी इस बात की तस्दीक करते हैं कि अकेले दिल्ली में सालाना 10 हजार से लेकर 30 हजार जानें जा रही हैं। एक और आंकड़ा ज्यादा भयावह है। इसके मुताबिक प्रदूषण हर दिन भारत की राजधानी में औसतन 80 लोगों की जान ले रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की ताजा रिपोर्ट में दुनिया के 20 सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में 13 भारत के शहर हैं, जिनमें दिल्ली शीर्ष पर है। यह आंकड़े इस बात की गंभीरता को बताने के लिए पर्याप्त हैं कि प्रदूषण की कैसी मार यहां के बाशिंदे झेल रहे हैं? जहां तक बात सरकार, सिविक एजेंसी, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड व अन्य संस्थाओं की है तो इनके तमाम सुझावों को अनसुना कर दिया जाता है।

अच्छे सुझाव जो सख्त होते हैं, उन्हें भी अमल में लाने के लिए पापड़ बेलने पड़ते हैं। मगर हालात जिस कदर खराब होते जा रहे हैं, उससे यही डर सता रहा है कि अगले कुछ सालों में प्रदूषण को लेकर देश की तस्वीर कैसी होगी? धूल की चादर ने दिल्लीवालों की सेहत के लिए ‘आपातकाल’ की स्थिति पैदा कर दी है। जनता से ग्रीन सेस लेने के बावजूद कई सरकारें पर्यावरण को लेकर संजीदा और सजग नहीं हैं। कई बार सर्वोच्च न्यायालय को सरकार के ढुलमुल रवैये पर सख्ती भी दिखानी पड़ी है। मगर प्रदूषण की गंभीरता बढ़ती ही जा रही है।

मंगलवार को जैसी आंधी दिल्ली-एनसीआर में दिखी, उसने एकबारगी पिछले साल के नवम्बर महीने की याद ताजा कर दी। फिक्र को धुएं में उड़ाने की सोच और आदत छोड़कर अपने देश के प्रति बुनियादी कर्त्तव्यों को समझना होगा। सिर्फ सरकार को दोषी ठहराने से हालात नहीं बदलेंगे।