धिक्कार है

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जब भी ऐसी खबर आती है हमारा दिल दहल जाता है। राजधानी दिल्ली के मोती नगर इलाके में सीवर में मरम्मत करने अंदर गए चार मजदूरों के प्राण पखेड़ू उड़ गए और एक जीवन-मौत के बीच झूल रहा है।  बताने की आवश्यकता नहीं कि उनकी मौत अंदर की जहरीली गैस से हुई। यह समझ से परे है कि बार-बार ऐसी ह्रदयविदारक त्रासदी के सामने आने के बावजूद सीवर में प्रवेश करने वालों को उनकी नियति पर छोड़ दिया जाता है यानी उनके लिए सुरक्षा कवच की व्यवस्था नहीं होती।

अभी पता नहीं चला है कि क्या संबंधित नगर निगम की ओर से यह सफाई कराई जा रही थी, या स्थानीय लोगों द्वारा? अगर निगम की ओर से कराई जा रही थी, तो यह अक्षम्य अपराध है। संबंधित अधिकारियों और उनके मातहत कर्मचारियों पर हत्या का अभियोग चलना चाहिए। अगर स्थानीय स्तर पर निजी लोग करा रहे थे तो यह सीख है कि आगे से कोई ऐसा न करे और आपस में चंदा कर उन मजदूरों के परिजनों तक राहत राशि पहुंचाई जाए।

उनकी गलती यह हो सकती है कि उन्होंने अपने वार्ड सदस्य या निगम को शायद सूचित नहीं किया या यह भी हो सकता है कि सूचना के बावजूद वे नहीं आए हों। कारण जो हो परिणाम तो वही है। हर कुछ अंतराल पर ऐसी दर्दनाक घटनाएं होती हैं, उस पर कुछ दिनों तक चर्चा भी होती है, लेकिन फिर वही स्थिति। न्यायालय का स्पष्ट आदेश है कि बिना सुरक्षा वस्त्र दिए किसी को सीवर के अंदर नहीं उतारा जा सकता।

ऐसा नहीं हो सकता कि निगमों के पास ऐसे वस्त्र न हों। हैं तो वस्त्र रहते हुए मजदूरों तक उनका न पहुंचना अपराध है। आखिर, जब दिल्ली में लगातार ऐसी त्रासदी सामने आने के बावजूद स्थिति में बदलाव नहीं हो रहा है तो छोटे और सामान्य शहरों में क्या होता होगा, इसकी आसानी से कल्पना की जा सकती है। मरने वाले गरीब होते हैं। इसलिए यह राजनीतिक हंगामे का विषय नहीं बनता। मीडिया भी खबर छापकर कर्त्तव्य की इतिश्री कर लेता है।

उनके परिवार को न्यायपूर्ण मुआवजा तक नहीं मिलता। कई बार तो मजदूर के गांव आदि के बारे में ठीक से पता नहीं चलता। जो मुआवजा घोषित होता है वह उनके परिजनों तक पहुंचता ही नहीं। जरा कल्पना करिए कि एक गरीब परिवार जिसका जीवन यापन उस मजदूर पर निर्भर है, उसकी क्या दशा होती होगी! क्या हमें यह स्थिति धिक्कारती नहीं?