धारा 377 : हंगामा है क्यों बरपा!

कु. नरेन्द्र सिंह,

पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने सहमति से दो वयस्कों के बीच कायम होने वाले समलैंगिक यौन संबंध को अपराध के दायरे से बाहर क्या कर दिया कि लगता है जैसे देश में भूकंप आ गया हो। समाचार पत्रों और टीवी चैनलों से लेकर सोशल मीडिया तक में अदालत के इस निर्णय की आलोचना हो रही है। कुछ लोगों की नजर में यह निर्णय भारतीय संस्कृति के खिलाफ तो है ही, अप्राकृतिक भी है। कई विद्वान इसे अवैज्ञानिक भी बता रहे हैं। जो लोग इस  फैसले को उचित बता रहे हैं, उनकी भाषा डरी-सहमी है। तो क्या सच में कोर्ट का फैसला भारतीय संस्कृति के खिलाफ और अप्राकृतिक यौन संबंधों को बढ़ावा देने वाला है?  सवाल का जवाब देने के पहले देखना-जानना जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट ने किस आधार पर धारा 377 को अपराध की श्रेणी से मुक्त किया है।
शीर्ष अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को बचाव नहीं करने वाला और मनमाना करार दिया है। उसका मानना है कि इस धारा से समानता के सिद्धांत का उल्लंघन होता है। स्पष्ट कहा कि धारा 377 एलजीबीटी के सदस्यों को परेशान करने का हथियार था। इसके कारण भेदभाव होता है। इस फैसले में गरिमा के साथ जीने के अधिकार को मौलिक अधिकार के तौर पर मान्यता दी गई है, क्योंकि धारा 377 के कारण एलजीबीटी सदस्य छुप कर और दोयम दरजे के नागरिक के रूप में रहने को विवश थे। जो लोग समलैंगिकता को भारतीय संस्कृति के विरूद्ध या अप्राकृतिक बता रहे हैं, वे वास्तव में भारतीय समाज में प्रचलित घिसी-पिटी धारणाओं के शिकार हैं। जिस समाज में सेक्स के बारे में बात करना भी गुनाह समझा जाता हो, वहां समलैंगिक संबंधों की वकालत करना किसी अपराध से कम नहीं। वास्तव में यह कहना ढोंग है कि समलैंगिक संबंध भारतीय संस्कृति के विरूद्ध है। सच तो यह है कि न केवल भारत बल्कि दुनिया के हर समाज में समलैंगिकता का प्रचलन रहा है। भारतीय समाज में भी समलैंगिकता गहरे पैठी हुई है। सच तो यह है कि भारतीय समाज में हमारा पहला यौन-संबंधी अनुभव समलैंगिक लोगों से ही प्राप्त होता है। कभी जाने में तो कभी अनजाने में और कभी-कभी उत्सुकता वश। समाज में लड़के-लड़कियों के बीच सहज संवाद को भी असहज ढंग से देखा जाता है। ऐसे में सबसे पहले समलिंगी अनुभव ही हमारे पल्ले में आता है। हम अपने गांव-घरों में जानते रहते हैं कि अमुक व्यक्ति समलैंगिक यौन संबंध रखता है, लेकिन उसे लेकर हम कभी व्यघ्र नहीं होते और ना कभी कोई परेशानी होती है। हम अपने अनुभव से जानते हैं कि समलैंगिक रु झान वाला व्यक्ति भी उतना ही सहज होता है, जितना अन्य। इसलिए यह कहना कि समलैंगिकता भारतीय संस्कृति के खिलाफ है, वास्तव में एक ढोंग है।
हमारे प्राचीन धर्मग्रंथों में भी समलैंगिक संबंधों की झलक मिलती है। वेद, पुराण से लेकर रामायण और महाभारत तक में समलैंगिकता को उजागर करने वाली अनेक कहानियां मिलती हैं। समलैंगिक संबंधों को अप्राकृतिक बताने वाले शायद नहीं जानते कि समलैंगिकता कोई विकृति नहीं, बल्कि प्रकृति ही है। वेद कहता है कि विकृति भी प्राकृतिक ही है, क्योंकि वह भी प्रकृति में ही शामिल है। खजुराहो और कोणार्क मंदिर की दीवारों पर समलैंगिक यौन मुद्राओं वाली मूर्तियां प्रमाण हैं कि भारतीय संस्कृति में समलैंगिकता कभी वर्जित नहीं रही। अगर वर्जित होती तो इसके खिलाफ दंड का प्रावधान भी जरूर होता लेकिन हमारे किसी भी धर्मग्रंथ में इसके खिलाफ दंड का विधान नहीं है।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र भी इसे केवल विकार मानता है, और समलैंगिक संबंध रखने वालों के लिए निम्नतम सजा का विधान रखता है, जिसमें गंगा नदी में स्नान करने से लेकर दान करने की बात कही गई है। अनेक कहानियां हैं, जिनमें परोक्ष रूप से समलैंगिक संबंधों का विवरण है। समलैंगिकता को हमारे देश में कभी अपराध नहीं माना गया। इसे आपराधिक कृत्य तो अंग्रेजों ने बनाया। दरअसल, समलैंगिकता को अपराध बताने का प्रचलन अब्राहमवादी नैतिकता से नि:सृत है, जिसे ईसाई धर्म ने परवान चढ़ाया। कोई यह न समझे कि अब्राहमवादी धर्मो यानी यहूदी, इस्लाम और ईसाई धर्म मानने वालों में समलैंगिकता का प्रचलन नहीं है। इस्रयल यहूदियों का देश है, लेकिन वहां समलैंगिकों को वे सारे अधिकार प्राप्त हैं, जो अन्य लोगों को प्राप्त हैं। तेल अवीव को तो दुनिया की गे कैपिटल कहा जाता है। इसी तरह इंग्लैंड, अमेरिका और स्कैंडिनेवियन देशों स्वीडन, फिनलैंड, नार्वे आदि में भी समलैंगिकों के अधिकार सुनिश्चित किए गए हैं। हमने विक्टोरियाई नैतिकता को ही अपनी नैतिकता समझ लिया और समलैंगिकता को अपराध मानने की मानसिकता गढ़ ली।
अधिकांश वैज्ञानिक मानते हैं कि मनुष्य की यौन अभिरुचि वातावरण, मान्यताओं और जैविक तत्वों के जटिल अंतरक्रिया की परिणाम होती है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण जैविक कारण होते हैं। किसी व्यक्ति के यौन रु झान का निर्धारण जीन से होता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि समलैंगिक रु झान के लिए माता-पिता के हार्मोन्स, क्रोमोजोम्स, बहुजैविक प्रभावों, मस्तिष्क की संरचना आदि जिम्मेदार होते हैं। वैज्ञानिकों की नजर में समलैंगिक यौन आकषर्ण, व्यवहार और अभिरुचि कोई विकृति नहीं, बल्कि सहज अभिरुचि है। इतना ही नहीं, वैज्ञानिक यह भी बताते हैं कि समलैंगिक संबंध रखने वाले संतुष्टिपूर्ण जीवन जी सकते हैं। अपने संबंधों के प्रति उतने ही ईमानदार हो सकते हैं, जितने अन्य आम लोग। वैज्ञानिक कहते हैं कि समलैंगिक संबंध कोई वैकल्पिक यौन संबंध का मामला नहीं है, बल्कि जेनेटिक है, जिसे किसी उपाय या परामर्श के जरिए बदला नहीं जा सकता। यदि मान लें कि समलैंगिकता का मूल कारण जेनेटिक है, तो हम नैतिकता के पचड़े में पड़ने से तो बच ही सकते हैं, साथ ही इसके लिए समलैंगिकों को दाषी ठहराने की प्रवृत्ति पर भी लगाम लगायी जा सकती है।
आधुनिक शोधों से स्थापित हो चुका है कि हमारी यौन अभिरुचि की उत्पत्ति जैविक है यानी समलैंगिकता भी उतनी ही प्राकृतिक है, जितनी विपरीतलिंगी यौनिकता। जैविक रूप से जन्मे पुरुष को किसी अन्य पुरुष के प्रति आकर्षित नहीं किया जा सकता। इसके लिए उसकी जैविक संरचना ही अलग होनी चाहिए। कहने की अर्थ यह कि समलैंगिक यौन संबंध के प्रति हमारा दृष्टिकोण स्टीरियोटाइप यानी घिसी-पिटी धारणा पर आधारित है, जिसका न तो कोई वैज्ञानिक आधार है, और न ही सांस्कृतिक। जरूरत है मानसिकता और समझ बदलने की।