धरा रह गया विस्थापित पंडितों से किया वादा

दीपिका भान, वरिष्ठ पत्रकार, नई दिल्ली

पनुन कश्मीर के एक नेता के मुताबिक ‘कश्मीरी पंडितों से किए वादे सिर्फ राजनीति पूरा करने के लिए हैं, हकीकत में कोई हमारे समुदाय की मदद नहीं कर रहा है।’ जब मोदी सरकार आई थी, तो कश्मीरी पंडितों के घर वापसी की भी बात कही गई। राज्य में बीजेपी ने पीडीपी के साथ तीन साल सरकार चलाई लेकिन कश्मीरी पंडितों के घर वापसी पर कुछ भी ठोस काम नहीं नहीं हो पाया

31 मार्च के दिन दिल्ली में विस्थापित कश्मीरी पंडितों के साथ हुई एक गोष्ठी के दौरान जम्मू-कश्मीर की तत्कालीन मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने इस अल्पसंख्यक समुदाय को कश्मीर वापस आने के लिए कहा ताकि युवा पीढ़ी और बच्चे अपनी जमीन को पहचान सकें।

पिछले तीन दशकों में पहली बार ऐसा हुआ कि राज्य के बाहर रह रहे विस्थापित कश्मीरी पंडितों से किसी मुख्यमंत्री ने बातचीत की। उनकी समस्याएं सुनीं। महबूबा मुफ्ती के इस बयान के बाद उनकी सरकार और पंडितों के कुछ संस्थानों ने फैसला किया कि इस साल की माता खीर भवानी मंदिर की यात्रा को एक बड़े उद्देश्य से जोड़ा जाए। और वह उद्देश्य है कश्मीरी पंडितों की घर वापसी का। माता खीर भवानी यात्रा को घर वापसी की दिशा में एक कदम के रूप में देखा जाना था।

कश्मीरी पंडितों के लिए कश्मीर में स्थित माता खीर भवानी मंदिर में हर साल ज्येष्ठ अष्टमी के दिन मेला लगता है। आतंकवाद के कारण इस समुदाय के लोग घाटी से पलायन करने के बाद भी हर साल इस प्राचीन मंदिर में दशर्न के लिए आते हैं, और अष्टमी के दिन जम्मू और दिल्ली से यात्रा भी निकालते हैं। तत्कालीन मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने कश्मीरी पंडितों की इस यात्रा के लिए विशेष प्रबंध कराए। पहली बार इस यात्रा के लिए राज्य सरकार ने मुफ्त बस सेवा शुरू की और महबूबा मुफ्ती की सलाह पर कश्मीरी पंडितों ने इस यात्रा को अपने घर वापसी की कोशिश में एक पहल के रूप में लिया। मेला 20 जून को हुआ, यात्रियों को मुफ्त बस सेवा भी मिली लेकिन महबूबा की तरफ से कश्मीरी पंडितों से न तो कोई मिलने आया और न ही पिछले साल की तरह इस बार महबूबा मुफ्ती मंदिर में पूजा करने आई।  

महबूबा से मिली हैरानी
इसको लेकर यात्रा में शामिल लोगों में हैरानी हुई। महबूबा की हुकूमत उसी दिन चली गई जिस दिन खीर भवानी मेले में शामिल होने के लिए दिल्ली से एक काफिला निकला था। इस यात्रा के संयोजक सतीश महलदार ने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री की बातों पर भरोसा करके ‘हम यहां आए कि अब हमारे घर वापसी की शुरुआत के लिए कदम उठ सकते हैं, लेकिन वह नहीं आई। हम मानते हैं कि हमारे घर वापसी आने पर राजनीति नहीं होनी चाहिए पर ऐसा नहीं हो रहा है। हमारे साथ फिर धोखा हो रहा है।’ यात्रा में शामिल लोगों का कहना है कि महबूबा को यात्रियों से मिलने आना चाहिए था क्योंकि इससे घाटी में समान सोच रखने वालों को बल मिलता। विस्थापितों के घर वापसी का रास्ता बनने में एक सकारात्मक पहल होती। लेकिन महबूबा ने इस ‘खास उद्देश्य वाली यात्रा’ में शामिल कश्मीरी पंडितों को निराश कर दिया।

विस्थापित कश्मीरी पंडितों की पीड़ा
ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, जब विस्थापित कश्मीरी पंडितों को कश्मीर में अपने घर वापस जाने के वायदे किए गए हों। पिछले तीन साल में बीजेपी-पीडीपी सरकार ने कई बार इस बारे में बातें तो कीं लेकिन वास्तव में ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जिसे ठोस माना जाए।  19 जनवरी, 2017 को जम्मू-कश्मीर विधान सभा में एक प्रस्ताव सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया। इसमें कहा गया कि जो कश्मीरी पंडित 1990 में आतंकवाद के कारण पलायन कर गए हैं, उन्हें वापस अपने घरों में लाने के लिए घाटी में सही वातावरण तैयार करना चाहिए।

प्रस्ताव के ठीक एक हफ्ते बाद खबर आई कि राज्य सरकार ने घाटी में आठ स्थानों में करीब 100 एकड़ जमीन की पहचान कर ली है, जहां कश्मीरी पंडितों का पुनर्वास किया जाएगा। बतौर मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने इस मामले पर एक रिपोर्ट गृह मंत्री राजनाथ सिंह को सौंप दी थी। उस समय यह भी कहा गया कि कश्मीर के काजीगुंड और बड़गाम जिलों में इस दिशा में काम तेजी से चल रहा है। पलायन के बाद पहली बार घाटी के इस अल्पसंख्यक समुदाय में अपने घर वापस जाने की आस फिर से जाग उठी। लेकिन इस पूरी मुहिम को तब झटका लगा जब पाकिस्तान-समर्थित आतंकवादी संगठनों और अलगाववादियों ने इसका जबरदस्त विरोध किया। जेकेएलएफ के अध्यक्ष  यासीन मलिक ने श्रीनगर में इसके खिलाफ मोर्चे निकाले।

हुर्रियत का कहना था कि हिन्दुओं के लिए अलग बस्ती बनाना उन्हें स्वीकार नहीं है। उनका कहना था कि पलायन से पहले जो कश्मीरी पंडित जहां रहते थे, वहीं आकर बस जाएं। पूरी घाटी में इस मामले को लेकर तनाव पैदा हुआ। विरोध के कारण तत्कालीन महबूबा सरकार ने पूरे प्लान को रोक दिया और इस पर फिर कोई कार्रवाही नहीं की गई। सच तो यह है कि अलग बस्तियों में बसने से कश्मीरी पंडित समुदाय भी ज्यादा खुश नहीं है। घाटी में सरकारी नौकरियां करने वाले कश्मीरी पंडितों के लिए कुछ जगह पर ट्रांजिट कैंप बनाए गए हैं। ये कैंप आये दिन पत्थरबाजों के निशाने पर रहते हैं। कई बार इन कैंपों पर ग्रेनेड हमले भी हो चुके हैं। 2016 में बुरहानी वानी की हत्या के बाद इन कैंपों पर जबरदस्त हमले किए गए जिसकी वजह से यहां रह रहे कश्मीरी पंडितों को घाटी से अपनी जान बचाने के लिए जम्मू भागना पड़ा था। इन कटु अनुभवों को देखते हुए अलग बस्ती बनाने की बात पर कश्मीरी पंडितों को आशंका हो रही है।

घाटी से पलायन
केंद्रीय गृह मंत्रालय के मुताबिक करीब 62,000 कश्मीरी पंडित परिवारों ने 1990 में घाटी से पलायन किया था। इनमें से 40,000 परिवार जम्मू में रजिस्र्टड हैं, 20,000 दिल्ली और 2,000 देश के अन्य शहरों में पंजीकृत हैं। 28 साल बीत जाने के बाद घाटी से जबरदस्ती निकाले गए इस अल्पसंख्यक समुदाय की घर वापसी के लिए जो आवाज और सहयोग घाटी से उठना चाहिए वह नदारद है। महबूबा ने भी कई वायदे किए लेकिन किसी भी वायदे को निभाना शायद उनकी मंशा से काफी दूर है।

पनुन कश्मीर के नेता रमेश मनवटी का कहना है कि ‘कश्मीरी पंडितों से किए वायदे सिर्फ राजनीति पूरा करने के लिए हैं, हकीकत में कोई हमारे समुदाय की मदद नहीं कर रहा है।’ 2014 में जब मोदी सरकार केंद्र में आई थी, तो कश्मीरी पंडितों के घर वापसी की भी बात कही गई। अब जब गठबंधन टूट गया और 2019 पास आ रहा है, कश्मीरी पंडितों का घर वापसी का मुद्दा फिर से उभरने लगा है। कश्मीरी पंडितों का मानना है कि घाटी में राजनेता, धर्मगुरू या सिविल सोसाइटी के लोग जब तक एक भावनात्मक माहौल नहीं तैयार करेंगे तब तक कश्मीरी पंडितों की घर वापसी संभव नहीं हो सकती। महबूबा ने दिल्ली में कश्मीरी पंडितों के साथ एक बात की लेकिन कश्मीर जाकर चुप्पी साध ली। ऐसे में पलायन कर चुके कश्मीरी पंडितों का बनवास लंबा होता जा रहा है।