दोधारी तलवार

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भारतीय थल सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत का विश्वास है कि आधुनिक युद्ध कला में सूचना युद्ध अहम है। उनके इस विचार से असहमत होने का कोई कारण नहीं है। जब सोशल मीडिया का अस्तित्व नहीं था, तब युद्ध के दौरान विभिन्न समाचार माध्यमों का इस्तेमाल किया जाता था। द्वितीय युद्ध के दौरान तानाशाह हिटलर के प्रचार मंत्री गोयब्लस का यह कथन आज भी याद किया जाता है कि किसी झूठ को सौ बार प्रचारित करने से वह सच में तब्दील हो जाता है। चाहे युद्ध का मैदान हो या क्रिकेट का मैदान, दोनों जगह प्रचार माध्यमों के जरिए मनोवैज्ञानिक युद्ध लड़ा जाता रहा है।

लिहाजा, आज के समय में सूचना युद्ध ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो गया है। सेना प्रमुख जनरल रावत ने यह स्वीकार किया है कि हमारा दुश्मन भी सोशल मीडिया का इस्तेमाल मानसिक युद्ध कला के रूप में हमें धोखे में डालने के लिए करेगा। ऐसे में हम यदि इसका फायदा नहीं उठाएंगे तो पिछड़ जाएंगे। कहा भी जाता है कि युद्ध और प्रेम में सब जायज है, लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि युद्ध के दौरान अंतरराष्ट्रीय कानूनों की अवहेलना हो। आखिर, युद्ध के साथ कुछ नैतिक नियम और परंपराएं भी नत्थी हैं, जिनका सैनिकों को पालन करना चाहिए। इन दिनों भारतीय सेना में सोशल मीडिया के इतिहास को लेकर बहस चल रही है।

सेना प्रमुख जनरल रावत ने इस बहस में हिस्सा लेते हुए यह स्वीकार किया है कि जब हम अपने सैनिकों को स्मार्ट फोन रखने से रोक नहीं सकते तो इसका इस्तेमाल करने से कैसे रोक सकते हैं? उन्होंने यह भी कहा कि एक ओर तो सैनिकों और अधिकारियों की समस्याओं के निराकरण के लिए ‘’अर्पण’ नामक मोबाइल एप तैयार किए जा रहे हैं और दूसरी ओर सैनिकों को सोशल मीडिया से दूर रहने की भी सलाह दी जा रही है। यह दोहरा मापदंड क्यों? आखिर यह कैसे संभव है?

वास्तव में आतंकवाद और छद्म युद्ध का मुकाबला करने के लिए सोशल मीडिया अहम हथियार बन सकता है। हालांकि यह भी सच है कि सोशल मीडिया दोधारी तलवार है, लिहाजा इसके इस्तेमाल को लेकर सैनिकों को अनुशासित रहना ही होगा। अतीत में हम देख चुके हैं कि एक जवान द्वारा फेसबुक के इस्तेमाल से हनीट्रैप के मसले पर सेना की बदनामी हो चुकी है। सो, सतर्क रहना वक्त की मांग है।