दिल्ली विवि : अंक आधारित प्रवेश परीक्षा क्यों?

डॉ. नवल किशोर,

स्कूली जीवन के अंतिम वर्ष में बोर्ड परीक्षा की तैयारी के साथ-साथ भविष्य में शिक्षा की संभावित दिशा भी उनके लिए चिंता का विषय होती है। स्नातक पाठय़क्रम में प्रवेश के लिए राष्ट्रीय स्तर के श्रेष्ठ संस्थाओं पर उनकी नजर होती है। दिल्ली विश्वविद्यालय का एक केंद्रीय विश्वविद्यालय होने के साथ-साथ राष्ट्रीय राजधानी में स्थित होने के कारण अभ्यर्थियों के लिए स्वाभाविक मंजिल बन जाता है। यही कारण है कि प्रति वर्ष जून-जुलाई के महीने में दिल्ली विश्वविद्यालय स्नातक पाठय़क्रमों में नामांकन की इच्छा रखने वाले छात्र-छात्राओं के लिए आकर्षण का केंद्र बना रहता है।
कला, विज्ञान और वाणिज्य में स्नातक डिग्री के लिए 56000 सीटें निर्धारित हैं, जो दिल्ली विश्वविद्यालय के करीब 70 कॉलेजों में बंटी हुई हैं। प्रत्येक कॉलेज अपने-अपने निर्धारित कट-ऑफ की सूचना दिल्ली विश्वविद्यालय प्रशासन को देता है, और फिर दिल्ली विश्वविद्यालय इन सूचनाओं को संकलित करके एक ऐसे कट-ऑफ की घोषणा करता है, जिसमें प्रत्येक कॉलेज की सूचना समाहित होती है।
दिल्ली विवि में यह प्रवेश प्रक्रिया काफी वर्षो से चली आ रही है, और आम तौर पर इसमें कोई समस्या भी देखने में नहीं आई है। लेकिन हाल के वर्षो में विभिन्न बोर्डों द्वारा घोषित परिणामों मे काफी असमानता देखी गई है, जिसके कारण कुछ राज्यों के छात्र-छात्राएं अपने बोर्ड में अच्छे अंक पाने के बावजूद दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रवेश नहीं ले पा रहे हैं, और दिल्ली विश्वविद्यालय में नामांकन का अवसर पाना उनके लिए सपना बन कर रह गया है। इस तथ्य को मानने के कारण मौजूद हैं कि दिल्ली विश्वविद्यालय की स्वीकृत कट-ऑफ प्रणाली विभिन्न बोर्डों के बीच जो असमानता है, उसके बीच सामंजस्य स्थापित नहीं करती है, और एक बेहद असमावेशी प्रवेश प्रणाली को जन्म देती है। देश के विभिन्न बोर्ड जैसे सीबीएसई, आईएससी तथा राज्यों के बोर्डों के पाठय़क्रमों, मॉडरेशन और मूल्यांकन की प्रक्रिया को देखें तो ये बेहद असमान दिखते हैं। इसलिए यह सवाल राज्य बोर्डों से निकले उम्मीदवारों के लिए काफी अहम है, जिनके टॉपर्स भी डीयू के कालेजों में प्रवेश पाने से वंचित रह जाते हैं। एक सूचना के अनुसार इस वर्ष के प्रतिभागियों का बोर्ड-केंद्रित अध्ययन करें तो चौंकाने वाले तथ्य दिखेंगे।
इस वर्ष दिल्ली विश्वविद्यालय में स्नातक नामांकन के लिए कुल 278,574 ऑनलाइन आवेदकों में से 249,694 (90 फीसदी) अभ्यर्थी सीबीएसई बोर्ड से थे, जबकि बाकी अभ्यर्थियों में से 22,266 यूपी बोर्ड,10,858 हरियाणा, 3,856 आईएससी बोर्ड और 9681 अभ्यर्थी एनआईओएस बोर्ड से संबंधित थे। स्पष्ट तौर पर यह दिखता है कि देश के अधिकतर राज्य-बोर्डों के छात्र उम्मीदवारी स्तर पर ही नदारद हैं, प्रवेश तो बहुत दूर की बात है। हम कह सकते हैं कि ये आवेदक संविधान द्वारा अवसर के अधिकार से ही वंचित रह जाते हैं। जाहिर है कि दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रवेश प्रक्रिया समावेशी नहीं दिखती। दो कारणों से ऐसा प्रतीत होता है। पहला, अंक-आधारित की के बजाय प्रवेश प्ररीक्षा को माध्यम के तौर पर क्यों नहीं अपनाया जा रहा, जबकि देश की अनेक शीर्ष संस्थाएं इस प्रक्रिया का इस्तेमाल कर रही हैं। दूसरा, अंक आधारित प्रवेश अगर बाध्यता है, तो अनेक बोर्डों के बीच कोई तर्क संगत समानता की रेखा खींचने का प्रयास क्यों नहीं किया जा रहा है? तकनीकी और वैज्ञानिक युग में परंपरागत तरीके से अन्यायपूर्ण दिखने वाली इस प्रवेश प्रणाली को ढोने का क्या औचित्य है?
लगभग चालीस फीसदी युवा जनसंख्या के साथ भारत एक युवा देश है, और इसमें से बहुसंख्यक युवा गांव और कस्बों से अपना भविष्य बनाने के लिए आते हैं। इनमें  से अधिकत्तर वंचित और उपेक्षित वर्ग से संबंध रखते हैं। संस्थाएं अगर इन युवाओं के प्रति संवेदनशील नहीं होंगी तो राष्ट्र निर्माण अधूरा ही रह जाएगा। दिल्ली विश्वविद्यालय देश का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय होने के नाते सबसे बड़ी संख्या में नामांकन का अवसर प्रदान करता है। अंक आधारित प्रवेश प्रणाली राज्य बोर्डों से निकले छात्र-छात्राओं की नजर में न्यायपूर्ण नहीं दिख रहा है। यह मानने का कारण मौजूद है कि बड़ी संख्या में मेधावी छात्र-छात्राएं बेहतर अवसर को पाने से वंचित रह जाते हैं। अगर मेधा विकास का मानक है, तो राज्य बोर्डों के मेधावी छात्रों के लिए डीयू में अंक आधारित प्रवेश प्रक्रिया घातक है। ‘दिल्ली दूर है’ लोकोक्ति इस संदर्भ में सही चरितार्थ होती है।