दिल्ली पहुंची लड़ाई

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मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड का जितना पक्ष अभी तक सामने आया है, उसके आधार पर इसे मनुष्यता को शर्मसार करने वाली जघन्य घटना मानने में कोई हर्ज नहीं है। उसके खिलाफ आक्रोश व्यक्त करने का अधिकार हर नागरिक को है। इस आधार पर राजनीतिक दलों के नेताओं का जंतर मंतर पर इकट्ठा होना सर्वथा उचित लगता है।

किंतु क्या वाकई इनका उद्देश्य उस कांड के पीड़ितों के साथ खड़ा होना और उन्हें न्याय दिलाने तक सीमित था? धरने का अयोजन राजद की ओर से किया गया था। तेजस्वी यादव इसका नेतृत्व कर रहे थे। उनके साथ इतने दलों के नेताओं का आना उनकी राजनीतिक सफलता को दर्शाता है। इसके अलावा वहां जिस तरह के भाषण हुए और सभी नेताओं के चेहरे पर जो हाव-भाव था उसका संदेश कुछ और ही था।

यह मुजफ्फरपुर की पीड़िताओं को न्याय दिलाने से ज्यादा 2019 आम चुनाव के लिए नरेन्द्र मोदी एवं भाजपा विरोधी एकजुटता का मंच बन गया। सारे भाषण उसी के इर्द-गिर्द हुए। यहां तक कि तेजस्वी यादव ने तो सारी मीडिया को भाजपा समर्थक घोषित कर दिया। यह आपत्तिजनक था। आपको जितना कवरेज मिलना चाहिए उससे ज्यादा मिला। दो दिनों से आपके विस्तृत वक्तव्य टीवी चैनलों पर चल रहे थे।

बावजूद यदि मीडिया से आपको शिकायत है तो यह एक राजनीतिक रणनीति के सिवा कुछ नहीं हो सकता। इसका एक ही उद्देश्य है पत्रकारों को दबाव में लाना। राहुल गांधी ने भी कहा कि केवल 5 प्रतिशत पत्रकार ही भाजपा समर्थक हैं, शेष डरे हुए हैं। देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के अध्यक्ष का यह बयान दुर्भाग्यपूर्ण है।

राहुल गांधी और कांग्रेस की ऐसी कौन खबर है, जिसे मीडिया नहीं प्रसारित-प्रकाशित करता? हमारा मानना है कि राजनीतिक दल आपस में लड़ें, एक दूसरे को आरोपित करें किंतु मीडिया को उसमें न घसीटें। मीडिया पर किसी तरह का अंकुश नहीं है। यह नहीं हो सकता कि देश की सबसे बड़ी पार्टी, जिसकी केंद्र से लेकर राज्यों तक में सरकार है, उसको मीडिया से गायब कर दिया जाए।

यह भी संभव नहीं कि जैसे कांग्रेस, राजद और अन्य विरोधी पार्टयिां चाहतीं हैं वैसे ही मोदी सरकार एवं भाजपा को दिखाया जाए। अच्छा होता राहुल और तेजस्वी व अन्य नेता मुजफ्फरपुर कांड की जघन्यता का ध्यान रखते हुए ऐसे वक्तव्यों और आम राजनीतिक हमलों से अलग रहते। ऐसा न करने का संदेश यही गया कि एक जघन्य कांड की आड़ में ये सब राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं।