दलीय हित सर्वोपरि

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भारतीय संविधान के परिशिष्ट दो में निहित अनुच्छेद 35(ए) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर, ये दोनों मुद्दे सर्वाधिक संवेदनशील हैं, और सीधे-सीधे राष्ट्रीय हितों को प्रभावित करने वाले हैं। लेकिन वोट बैंक की सियासत ने इनको राजनीतिक मसला बना दिया है। लोकतंत्र में एक दल का प्रभुत्व किस तरह राष्ट्रीय हितों की बजाय दलीय हितों को आगे बढ़ाने का काम करता है, इसका बेहतर नमूना अनुच्छेद 35(ए) है।

इसे पूर्व प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू की सलाह पर पूर्व राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा पारित एक आदेश के जरिए 1954 में संविधान में जोड़ा गया। यह अनुच्छेद जम्मू-कश्मीर विधानसभा को अधिकार देता है कि वह राज्य के स्थायी निवासियों और उनके विशेषाधिकारों को परिभाषित कर सके। सुप्रीम कोर्ट में इस अनुच्छेद की संवैधानिक वैधता को चुनौती दिए जाने के बाद कश्मीर के राजनीतिक दलों के साथ अलगाववादियों को भी लोगों की भावनाएं भड़काने का मुद्दा मिल गया है। लेकिन इस का सर्वाधिक दुखद पहलू है कि कांग्रेस और केंद्र की भाजपा सरकार का रुख लचर है।

हालांकि ऐतिहासिक तथ्य तो यही है कि अनुच्छेद 35(ए) कांग्रेस की देन है, लेकिन दिलचस्प यह है कि इस मुद्दे पर भाजपा संगठन और सरकार में मतैक्य नहीं हैं। भाजपा इस अनुच्छेद को हटाने के पक्ष में है, तो दूसरी ओर केंद्र सरकार सूबे के लिए वार्ताकार नियुक्त किए जाने का हवाला देकर सुप्रीम कोर्ट से इस मसले पर सुनवाई टालने का आग्रह कर रही है।

राष्ट्रवादी कहने का दावा करने वाली भाजपा और उसकी सरकार से इस मुद्दे पर दृढ़ रुख की अपेक्षा थी। राष्ट्रीय अखंडता और संप्रभुता को चुनौती देने वाले मुद्दों के खिलाफ लिए गए कड़े फैसलों की समीक्षा करने का दायित्व इतिहास पर छोड़ देना चाहिए। सरकारें आतीं-जातीं रहती हैं। इसलिए कहने में संकोच नहीं होना चाहिए कि सभी दलों के एजेंडों में देश हित के बजाय दलीय हित सर्वोपरि हैं।

असम के राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के संदर्भ में भी यही दिखाई दिया। सूबे में कांग्रेस की सरकार एक दशक तक इसे दबाए बैठी रही और भाजपा सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट की सक्रियता के बाद ही इस रजिस्टर पर कार्रवाई शुरू की। अनुच्छेद 35(ए) और एनआरसी, दोनों देश की बुनियादी समस्याएं हैं। बेहतर होगा कि राष्ट्रीय और स्थानीय पार्टियां इन दोनों संवेदनशील मसलों पर एकजुट होकर देशहित में राष्ट्रवादी नजरिए पेश करें।