दमदार लड़ाई के मैदान

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निर्वाचन आयोग ने पांच राज्यों-छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान, मिजोरम और तेलंगाना-की विधान सभाओं के लिए चुनाव की घोषणा कर दी है। ये चुनाव नवम्बर और दिसम्बर में कराए जाएंगे। मतगणना 11 दिसम्बर को होगी। अगले साल होने वाले लोक सभा चुनाव से पहले यह ऐसा विधान सभा चुनाव है, जहां कांग्रेस और भाजपा की दमदार लड़ाई होगी।

इनमें छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान वे राज्य हैं, जहां भाजपा की सरकार है। इनमें भी छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश भाजपा का वह दुर्ग है, जहां 15 साल से उसकी सरकार है। राजस्थान में पिछले पांच वर्ष से उसकी सरकार है। चूंकि इन तीनों राज्यों में भाजपा की सरकार है, इसलिए जनता में सत्ता विरोधी रु झान का होना स्वाभाविक है। जाहिर है इन तीनों राज्यों में विकास एक चुनावी मुद्दा होगा, लेकिन अभी से यह भी साफ है कि मध्य प्रदेश और राजस्थान में जाति एवं धर्म भी चुनाव को प्रभावित करने वाले अहम कारक होंगे।

हालांकि इन राज्यों में भाजपा और कांग्रेस की सीधी लड़ाई रही है, लेकिन अगर कांग्रेस ने सत्ता विरोधी मतों के बिखराव को रोकने के लिए बसपा से गठबंधन कर लिया होता, तो उसकी राह आसान हो जाती। उत्तर-पूर्व भारत में मिजोरम एकमात्र ऐसा राज्य है, जहां कांग्रेस की सरकार बची है। भाजपा चाहेगी कि यहां से भी उसका पैर उखाड़ दे। आंध्र प्रदेश के विभाजन के बाद बने तेलंगाना राज्य में कांग्रेस अपनी सरकार नहीं बना पाई थी। वहां चंद्रशेखर राव के नेतृत्व में टीआरएस ने सरकार बनाई थी। अपनी गिरती साख को बचाने के लिए कांग्रेस इसे हर हाल में जितना चाहेगी।

इन राज्यों के चुनाव परिणाम का न केवल इन राज्यों के लिए महत्त्व है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी इसका प्रभाव पड़ेगा। हालांकि राज्य विधान सभा चुनाव को प्रभावित करने वाले वही कारक नहीं होते, जो लोक सभा चुनाव में होते हैं। फिर भी इससे जनता के मिजाज का कुछ अंदाजा मिल सकता है।

अगर कांग्रेस छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में से दो या एक भी राज्य भाजपा से छीन लेती है, तो राष्ट्रीय राजनीति में उसका कद बढ़ जाएगा। ऐसे में इन राज्यों में कांग्रेस के साथ गठबंधन न होने पर बसपा और सपा का दोषारोपण अतीत का विषय बन जाएगा। तब कांग्रेस के लिए भाजपा विरोधी गठबंधन का अगुआ होने की संभावना मजबूत हो जायेगी, अन्यथा भाजपा विरोधी गठबंधन की राजनीति नई राह भी पकड़ सकती है, जो भाजपा के लिए उपयुक्त होगी।