त्वरित न्याय, सही न्याय

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इंदौर के जिला न्यायालय ने एक दुधमुंही बच्ची के अपहरण, बलात्कार और हत्या के मामले में अभियुक्त को घटना के 22 दिनों के अंदर जिस तरह सजा सुनाई वह ऐसे अपराधों की न्याय प्रक्रिया के लिए नजीर बनना चाहिए। 19-20 अप्रैल की रात को हुई इस घटना ने पूरे देश को झक-झोड़कर रख दिया था। तीन महीने चार दिन की एक बच्ची, जो अपने माता-पिता के साथ सोयी थी, उसे उठाकर ले जाने वाले 26 वर्षीय नवीन गाडके ने पहले उसके साथ बलात्कार किया और फिर उसे निर्ममतापूर्वक पटककर हत्या कर दी।

इस कांड के बाद मध्य प्रदेश सरकार ने विशेष जांच दल का गठन किया था। इसने तेजी से केवल आठ दिनों में जांच पूरी कर चालान पेश कर दिया। प्रतिदिन सुनवाई हुई, सात दिनों में 29 गवाहों के बयान हुए और फिर फैसला आ गया। उसे दंड विधान (संशोधन) अधिनियम 2013 के तहत अस्तित्व में आई भारतीय दंड विधान धारा 376 (ए) (बलात्कार के दौरान आई चोटों से पीड़ति की मृत्यु) और इसी विधान की धारा 302 (हत्या) के तहत दोहरी फांसी की सजा सुनाई गई।

साथ ही भारतीय दंड विधान की ही अन्य संबद्ध धाराओं और लैंगिक अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम यानी पॉक्सो के तहत आजीवन कारावास एवं पांच हजार रु पया जुर्माना लगाया गया। साफ है न्यायालय ने इसे विरलों में विरलतम अपराध मानकर ही उसे दोहरी फांसी सहित कई प्रकार की सजा सुनाई है।

इसका संदेश यही निकला है कि ऐसे मामलों में यदि पुलिस और न्यायालय दोनों संकल्प कर लें तो फिर अपराधी या अपराधियों को कम दिनों में सजा दी जा सकती है। न्याय प्रक्रिया में कई बार इतना समय लग जाता है कि उसके बाद न्याय होना न होना कोई मायने नहीं रखता। लंबी न्यायिक प्रक्रिया का लाभ कई बार आरोपित भी उठाते हैं।

इस मुकदमे ने विलंबित न्यायिक प्रक्रिया के चरित्र से मुक्ति का प्रमाण दिया है। जिस तरह हाल में मासूम बच्चियों के साथ बर्बरता के मामले लगातार सामने आ रहे हैं, उससे देश भर में क्षोभ का वातावरण है। लोग चाहते हैं कि अपराधियों को तुरंत सजा मिले, जिससे ऐसी मानसिकता वालों के अंदर भय पैदा हो एवं बच्चियां सुरक्षित हो सकें। यह तभी हो सकता है जब जांच दल जांच प्रक्रिया से लेकर आरोप पत्र पेश करने में कम समय लगाए और अदालत उसी तेजी से मुकदमे का निपटारा कर दे।