..तो बम किसने फोड़ा?

,

हैदराबाद की मक्का मस्जिद विस्फोट मामले में आरोपितों का बरी होना एक साथ कई बातों का द्योतक है। न्यायालय ने कहा कि अभियोजन पक्ष एक भी आरोपित के खिलाफ ऐसा सबूत पेश नहीं कर सका जिससे माना जाए कि वाकई उस विस्फोट में उनकी भूमिका थी। यह एनआईए की भूमिका पर एक कड़ी टिप्पणी है। 18 मई 2007 को हुए विस्फोट में 9 लोग मारे गए एवं 58 घायल हुए थे।

वस्तुत: यह एक बड़ा विस्फोट था किंतु बम संगमरमर की बेंच के नीचे रखे जाने से ज्यादा क्षति नहीं पहुंच सकी, अन्यथा जुम्मे की नमाज के समय जितनी संख्या में लोग उपस्थित  थे, उसमें काफी लोगों की जानें जा सकती थीं। पुलिस ने बाद में तीन जिन्दा बम और बरामद किया था। वास्तव में उसके पीछे एक बड़ी साजिश थी। ऐसे मामले में यदि 11 वर्षो बाद भी कोई साजिशकर्ता जांच एजेंसियों के हाथ नहीं लगा तो यह अत्यंत ही चिंता का विषय है।

जब आतंकवादी मामलों पर भी राजनीतिक हावी होने लगेगी तो परिणाम ऐसा ही आएगा। आरंभ में जब जांच पुलिस के हाथों थी, 38 लोगों को हिरासत में लिया गया और स्थानीय पुलिस आयुक्त ने इसमें हुजी के हाथ होने की बात कही। यूपीए सरकार ने मामले को सीबीआई को सुपुर्द किया और बाद में उसे एनआईए को सौंप दिया गया। यह वही समय था, जब यूपीए सरकार की तरफ से संगठित हिन्दू आतंकवाद या भगवा आतंकवाद की खूब चर्चा हो रही थी। मक्का मस्जिद से लेकर अजमेर दरगाह, समझौता एक्सप्रेस एवं मालेगांव विस्फोटों के पीछे हिन्दू आतंकवाद का हाथ बताया जाने लगा था।

दुर्भाग्यवश जांच भी इसी दिशा में चली गई। जब नवम्बर 2010 में स्वामी असीमानंद को गिरफ्तार किया गया तो बताया गया कि हमले का मास्टर माइंड यही था। पहले सीबीआई और बाद में एनआईए ने हिन्दू संगठनों से जुड़े लोगों पर ही फोकस किया। उसने 166 लोगों की न्यायालय में गवाही करवाई। किंतु सरकार बदलने के साथ गवाह पलटने लगे। 54 मुख्य गवाहों ने बयान दिया कि उनसे जबरन धमका कर बयान लिया गया था।

न्यायालय के फैसले के बाद यह कहने में कोई हर्ज नहीं है कि पूरे मामले को ठोस तथ्यों और सबूतों के आधार पर आगे बढ़ाने की जगह फर्जी सबूत एवं कथानक बनाए गए जो अंतत: अदालत में ध्वस्त हो गए। किंतु उस हमले का कोई न कोई अपराधी तो है। देश को वह असली अपराधी चाहिए। जरूरी है कि एनआईए असल गुनहगार को कठघरे में खड़ा करे।