तोगड़िया की छुट्टी

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विश्व हिन्दू परिषद का चुनाव पहली बार इतनी सुर्खियां पा रहा है। इसका मुख्य कारण है, पूर्व कार्यकारी अध्यक्ष प्रवीण तोगड़िया और उनके करीबी लोगों की विदाई। वास्तव में इस चुनाव की घोषणा के साथ ही विहिप चर्चा का विषय बन गया था, क्योंकि संगठन की ओर से कई प्रकार की खबरें मीडिया को दी जाने लगीं थीं। तोगड़िया ने पहले ही आरोप लगा दिया था कि चुनाव के लिए कुछ गलत लोगों को नामांकित किया गया है।

हालांकि विहिप के न्यासी मंडल ने इसे स्वीकार नहीं किया। नवनिर्वाचित अध्यक्ष सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति विष्णु सदाशिव कोकजे ने जिन अधिकारियों को नियुक्ति किया, उसमें तोगड़िया का कोई प्रकट समर्थक नहीं है। इसका इतना अर्थ तो निकाला ही जा सकता है कि विहिप के अंदर गुटबंदी लंबे से चल रही थी।

इसका आभास उसी समय हो गया, जब तोगड़िया ने अहमदाबाद में राजस्थान और गुजरात पुलिस पर उनके घर आने और गिरफ्तार करने की कोशिश का आरोप लगाया था। इस पर देश भर से प्रतिक्रियाएं आई लेकिन दिल्ली स्थित विहिप कार्यालय ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। उल्टे यहां के लोग बताते थे कि ऐसा हुआ ही नहीं है।

यानी संगठन में दो गुट साफ तौर पर काम कर रहे थे। वर्तमान चुनाव परिणाम उसी की परिणति है। तोगड़यिा ने कहा है कि चालीस वर्षो बाद अब मैं विहिप में नहीं हूं, लेकिन हिन्दू समाज के लिए काम करता रहूंगा। पता नहीं आगे वे क्या करने वाले हैं?

किंतु किसी भी संगठन में कोई व्यक्ति आजीवन पद पर बना रहे ऐसा नहीं होता। पद जाने से किसी का संगठन से विलगाव हो जाए तो इसका अर्थ यही लगाया जाएगा कि वे केवल पद के कारण ही संगठन में थे।

अगर यह मान लिया जाए कि संघ भी तोगड़िया से मुक्ति पाना चाहता था तब भी इतने बड़े नश्वेता को ऐसे समय शांत और संयत रहने की आवश्यकता थी। आप बिना पद के भी शांति से काम कर सकते हैं। अनेक भूमिकाएं आपकी हो सकतीं हैं। इस तरह विद्रोह का झंडा उठाने से तोगड़िया को मिलेगा क्या? व्यक्ति की शक्ति संगठन में निहित होती है।

संगठन छोड़ने के बाद कुछ ही लोगों ने समानांतर संगठन खड़ा करने को अपने को पुर्नस्थापित किया है। संघ परिवार में तो ऐसा कभी हुआ ही नहीं। जो छोड़कर गए वे या तो गुमनामी में चले गए या फिर किसी-न-किसी रूप में उन्हें वापस आना पड़ा।