तेहरान की तबाही

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले मई को ईरान के साथ परमाणु समझौते को रद्द करके यह स्पष्ट कर दिया था कि वह तेहरान पर दबाव बनाने के लिए कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाएंगे। बहरहाल, ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध का पहला चरण शुरू हो गया है। इसके तहत अब ईरान सरकार न तो अमेरिकी मुद्दा खरीद पाएगी और न ही अमेरिका के साथ कारों और कालीनों का कारोबार कर पाएगी। ट्रंप ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान इस समझौते को बेतुका और एकतरफा बता कर इसे रद्द करने का वादा किया था।

गौरतलब है कि जुलाई 2015 में ओबामा प्रशासन के समय ईरान और सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों के बीच यह परमाणु समझौता हुआ था। उस दौरान राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इस समझौते के तहत ईरान के परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने के बदले में तेहरान पर लगाये गए कुछ पाबंदियों को शिथिल कर दिया था। लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप का मानना है कि यह समझौता ईरान को परमाणु बम बनाने की प्रक्रिया को रोकने में पूरी तरह नाकाम रहा है। उनका आरोप है कि बल्कि इसकी आड़ में ईरान ने अपने विवादस्पद कार्यक्रम और तेज कर दिया।

लिहाजा, अमेरिका को इस समझौते से अपने को अलग करना पड़ा। वास्तव में, ट्रंप इस समझौते को रद्द करने के बाद ईरान की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह तबाह कर देना चाहते हैं। ट्रंप का विश्वास है कि आर्थिक तौर पर कमर टूटने के बाद ईरान न तो मध्य एशिया में आतंकवाद को बढ़ावा दे पाएगा और न ही परमाणु बम विकसित करने का सपना पूरा कर पाएगा।

पांच नवम्बर से आर्थिक प्रतिबंध का दूसरा चरण शुरू होगा। इससे ईरान के कच्चे तेल की बिक्री पर रोक लगेगी। अमेरिकी प्रतिबंधों की घोषणा का दुष्प्रभाव ईरानी अर्थव्यवस्था पर पड़ने लगा है। ईरान की राष्ट्रीय मुद्दा रीयाल का अस्सी फीसद मूल्य गिर गया है। राजधानी तेहरान सहित अन्य शहरों में सरकार विरोधी प्रदर्शन होने लगे हैं।

प्रतिबंधों की सबसे ज्यादा मार मध्य वर्ग पर पड़ रही है। ऑटोमोटिव क्षेत्र पर लगे प्रतिबंधों से नौकरियां जा रही हैं। दवा और रोजमर्रा की चीजें लोगों की पहुंच से दूर हो रही हैं। अहम सवाल है कि क्या ईरान की सरकार को इस आर्थिक तबाही की कीमत पर परमाणु कार्यक्रम की महत्त्वाकांक्षा को जारी रखनी चाहिए।