तीन तलाक के बाद

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सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस भेज कर जवाब मांगा है। मुसलमानों में प्रचलित बहुविवाह और निकाह हलाला की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अदालत विचार करेगी।

इसके लिए पांच सदस्यीय संविधान पीठ का गठन करने की भी बात की गई। अधिवक्ता व भाजपा नेता अिनी उपाध्याय ने जनहित याचिका द्वारा दावा किया है कि मुसलमान औरतों के उनके बुनियादी अधिकार दिलाने के लिए इन प्रथाओं पर प्रतिबंध लगाने की आवश्यकता है।

याचिका में कहा है कि तीन तलाक, बहुविवाह व निकाह हलाला से मुसलमान औरतों को नुकसान हो रहा है। इससे उनके संविधान के अनुच्छेद 14,15,व 21 में प्रदत्त मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है। तीन मुसलमान स्त्रियों ने भी सबसे बड़ी अदालत से इस प्रथा को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की है।

बीते अगस्त में सर्वोच्च अदालत द्वारा तीन तलाक के खिलाफ फैसला देने के बाद से ही निकाह हलाला और चार शादियों के खिलाफ मुहिम चालू हो गई थी। जैसा कि, मुसलमान पुरुष को चार शादियां करने की इजाजत है। वह भी बिना पहली बीवी को तलाक दिए। तीन तलाक, चार पत्नी या हलाला जैसी प्रथाएं सीधे स्त्री अधिकारों का हनन है। खुद मुसलमान औरतें इनके खिलाफ मुखर हो रही हैं।

कट्टरपंथी, दकियानूस पुरुषों द्वारा  बार-बार इन कुप्रथाओं के पक्ष में तरह-तरह की दलीलें दीं जाती हैं। स्त्री पढ़-लिख रही है, उसे अपने वजूद की फिक्र है। वह पुरुष द्वारा इस तरह दुत्कारे जाने को लेकर काफी सशंकित रहा करती थी। असुरक्षा स्त्री के आत्मसम्मान और उसके वजूद को हमेशा छलनी करती रहती है।

बाहर की दुनिया में वह जितनी असुरक्षित है, परिवार के भीतर भी उसे इस तरह की प्रथाओं का भय हमेशा रहता है। दूसरी शादी या तलाक उनके लिए तलवार की धार सरीखी हैं। हलाला की मांग करने वाले भी वही पुरुष हैं, जो तैश में आकर पहले तलाक दे देते हैं, बाद में अपनी गलती का अहसास होने पर बीवी पर किसी अन्य पुरुष से शादी करके, उसे तलाक देकर वापस लौटने का दबाव बनाते हैं।

तलाक, चार शादियां और हलाला में स्त्री की मर्जी के लिए कोई जगह नहीं है। यही कारण है कि पुरुषों में इनके खिलाफ आम सहमति नहीं है। अदालत की पहल तो पहला कदम है। असल में, सरकार के जवाब से सुधार की गुंजाइश की उम्मीद की जा सकती है।