ताज पर सुप्रीम सख्ती

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मोहब्बत की अप्रतिम निशानी ‘ताजमहल’ संकट में है। अपने सफेद संगमरमरी हुस्न के चलते विश्व भर के पर्यटकों के दिलों में अमिट छाप छोड़ने वाली इस इमारत का रंग हाल के वर्षो में बदरंग हो गया है। इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जाहिर की है। शीर्ष अदालत ने कहा कि पहले इस स्मारक का रंग पीला हुआ फिर यह हरा और भूरा होता जा रहा है।

आखिर इसकी फ्रिक किसे है? क्या सरकार के पास इसे दूर करने की विशेषज्ञता है या नहीं? साफ है अदालत सरकार और ऐतिहासिक धरोहरों की देखरेख के लिए अधिकृत संस्थाओं की लापरवाही भरे रवैये को लेकर सकते में है। विशेषज्ञता होते हुए भी इस समस्या का निदान नहीं ढूंढ़ने के लिए अदालत ने व्यंग्य भरे लहजे में यह भी कहा कि अदि आपके पास विशेषज्ञता हो तो भी आप इसका उपयोग नहीं कर रहे हैं। या शायद आप परवाह नहीं करते।

अदालत की इस खीज को सरकार खारिज नहीं कर सकती है। इसका हल निकालना ही एकमात्र विकल्प है। ताजमहल न केवल भारत अपितु विश्व की सर्वश्रेष्ठ इमारतों में से एक है। इसका इस तरह धीरे-धीरे निस्तेज होना वाकई चिंता का सबब है। ऐतिहासिक धरोहर और भ्रमण स्थल हमारी संस्कृति के प्रतीक हैं। यह देश के गौरवशाली अतीत की निशानी हैं। सरकार और हर देशवासी को इसकी महत्ता का पता होना चाहिए।

अतीत के पन्नों को हमारी विरासत के तौर पर कहीं पुस्तकों तो कहीं इमारतों के रूप में संजोकर रखा जाता है। लेकिन ताजमहल की सुंदरता को लेकर सरकार की हीलाहवाली से यह आशंका ज्यादा बलवती होती है कि देश में विश्व विरासत घोषित स्मारकों या इमारतों के हालात बेहतर होंगे या उनका हाल बुरा ही होगा? 2003 के बाद से ताजमहल की चमक धुंधली पड़ने लगी थी।

उसके बाद पूर्वस्थिति बहाल होने के लिए ‘फेसपैक’ और ‘मसाज’ का दांव भी आजमाया गया। कल-कारखाने बंद कराए गए। साथ ही तमाम तरह के उपाय भी अमल में लाए गए। मगर ताजमहल की चमक फीकी ही पड़ती गई। यहां तक कि यमुना नदी में प्रदूषण समेत मथुरा रिफाइनरी को लेकर भी नीतियां बनाई गई। लेकिन समाधान नहीं निकल सका।

सो, सुप्रीम कोर्ट की सजगता और चिंता को इज्जत बख्शते हुए बिना वक्त गंवाए सरकार इस ओर अगर ईमानदारी और संजीदगी के साथ आगे बढ़े तो हालात निश्चित ही बेहतर होंगे।