तमिलनाडु में हिंसा

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तमिलनाडु के तूतीकोरिन जिले में वेदांता स्टरलाइट तांबा संयंत्र के खिलाफ जारी प्रदर्शन में 11 प्रदर्शनकारियों की पुलिस की गोलियों से मौत दुखद घटना है। इस पूरे प्रकरण में संयंत्र को चालू रहना चाहिए या बंद करना चाहिए यह प्रश्न तो है। लेकिन इस प्रकरण ने जो मोड़ लिया है, उससे बचा जा सकता था। प्रदर्शनकारियों को प्रदर्शन करने का अधिकार है तो पुलिस पर कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेवारी। दोनों पक्षों को अपनी सीमाओं का ध्यान रखना चाहिए। जैसे ही यह सीमा टूटती है, उसके परिणाम ऐसे ही भयावह होते हैं।

सरकार ने न्यायिक जांच के आदेश दे दिए हैं तो यह मानकर चलना चाहिए कि हमारे सामने इस भयावह गोलीकांड का सच आ जाएगा। किंतु इससे फर्क क्या पड़ेगा? जिनकी जान चली गई वो तो वापस आने से रहे। इस संयंत्र के खिलाफ एक समूह लंबे समय से आंदोलन कर रहा है। सौ दिन से चला आ रहा प्रदर्शन बीच-बीच में कई बार हिंसक हुआ मगर उस पर काबू पा लिया गया। 21 मई को प्रदर्शनकारी जिस तेवर में एक चर्च के पास एकत्रित होकर आगे बढ़े उससे साफ था कि अगर इनको नियंत्रित नहीं किया गया तो अनहोनी होगी।

वे जिलाधिकारी परिसर की ओर बढ़ते गए, पुलिस बैरिकेड को भी नहीं माना, रास्ते में वे आगजनी एवं तोड़फोड़ करते जा रहे थे..सरकारी कार्यालयों से लेकर बैंक तक उनका निशाना बनते गए..। जिलाधिकारी परिसर में खड़े पुलिस और सरकारी वाहनों को भी आग के हवाले कर दिया। फिर पत्थरबाजी शुरू कर दी। उसके बाद जो हुआ वह सबके सामने है। हम किसी भी आंदोलन के इस तरह के हिंसक व्यवहार का समर्थन नहीं कर सकते परंतु यह पुलिस प्रशासन की दयनीय विफलता को भी उजागर करती है। क्या खुफिया विभाग सोई हुई थी, जिसने पुलिस को सचेत नहीं किया?

इतनी संख्या में उग्र भीड़ किस तरह शहर में आग लगाते बढ़ती गई? उसे हर हाल में रोका जाना चाहिए था, जिसके लिए गोली चलाना जरूरी नहीं था। समय पूर्व सुरक्षा के पर्याप्त उपाय न करने के कारण ऐसी नौबत आई। वैसे भी इस संयंत्र को बंद करने का मामला सर्वोच्च न्यायालय में चल रहा है। इस बीच, सरकार उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती; यह आंदोलनकारियों को भी समझना चाहिए।

पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता ने 2013 में गैस रिसाव के बाद इसे बंद करवा दिया था, लेकिन एनजीटी ने इस आदेश को रद्द कर दिया। फिर भी यह घटना जानलेवा प्रदूषण के प्रति त्वरित नीति के अवलम्बन की बात करती है।