ट्रंप-किम भेंट : वार्ता का अंतरराष्ट्रीय महत्त्व

सतीश कुमार,

सिंगापुर में सम्पन्न वार्ता निश्चित तौर पर ऐतिहासिक मानी जा सकती है। 27 अप्रैल को दोनों कोरियाई देशो के मिलने के बाद से इस शिखर वार्ता की ओर दुनिया की निगाहें टिकी हुई थी। वार्ता इसलिए अहम है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने किम जोंग उन की खूब जमकर प्रशंसा की। 73 वर्षीय अमेरिकी राष्ट्रपति ने 34 वर्षीय किम को मेघावी और बुद्धिमान बतया। यह विशेषण उत्तर कोरिया के लिए काफी महत्त्व रखता है। 2017 में उत्तर कोरिया ने परमाणु मिसाइल से अमेरिका को वेधने की धमकी दी थी। दूसरी तरफ अमेरिका ने उत्तर कोरिया को बर्बाद करने की कसम खाई थी। उसके बाद अमेरिका का हृदय परिवर्तन और किम जुंग के लिए इन शब्दों का प्रयोग विश्व राजनीति के लिए मायने रखता है।
शिखर वार्ता में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से सुरक्षा गारंटी के एवज में उत्तर कोरिया के तानाशाह किम ने कोरियाई प्रायद्वीप के संपूर्ण परमाणु निशस्त्रीकरण का वादा किया। इस वार्ता से पूर्वी एशिया में शांति की पहल शुरू हो जाएगी। वार्ता को पूरी तरह से सफल मानना जल्दबाजी होगी। कई प्रश्न अधर में लटके हुए हैं। क्या अमेरिका आर्थिक प्रतिबंध उठा लेगा बिना पूरी तरह से निशस्त्रीकरण की प्रक्रिया पूरी हुए? क्योंकि दोनों देश की परिभाषा और समझ निशस्त्रीकरण के संदर्भ में बिल्कुल अलग है। उत्तर कोरिया एक ही साथ अपने  आणविक हथियारों को खत्म नहीं करना चाहता। उसकी सोच क्रमबद्ध तरीके से आणविक हथियारों को नेस्तनाबूद करने की है। अर्थात अमेरिका जैसे जैसे उत्तर कोरिया से आर्थिक प्रतिबंध को हटाता जाएगा, वैसे-वैसे उत्तर कोरिया हथियारों के जखीरे को खत्म करता जाएगा। दोनों की सोच में कई विसंगतियां हैं। दोनों को एक-दूसरे पर भरोसा नहीं है।
उ. कोरिया की आणविक तैयारी 1950 के कोरियाई युद्ध के बाद से ही शुरू हो गई थी। इस प्रयास में उसे रूस और चीन से मदद मिली थी। 2003 में पश्चिमी दुनिया को इस बात की जानकारी मिली। उसके बाद से ही अमेरिका ने शिंकजा कसना शुरू कर दिया था। 2006 में उत्तर कोरिया ने पहला आणविक परीक्षण कर अपनी बात सिद्ध कर दी। तब से लेकर अमेरिकी नजरों में उत्तर कोरिया सूई की तरह चुभता रहा। स्थिति इतनी भयानक हो गई की उत्तर कोरिया अमेरिका जैसे देश को सबक सिखाने की धौंस देने लगा।
यह भी सच है कि पूरी दुनिया में उत्तर कोरिया का हितैषी चीन और अमेरिका के सिवा कोई नहीं है। फिलहाल दुनिया में कई तरह के विवाद युद्ध की आशंका को पैदा कर रहे हैं। सीरिया को लेकर अमेरिका और रूस एक-दूसरे के आमने-सामने हैं। उत्तर कोरिया और अमेरिकी द्वंद्व में चीन भी शामिल है। पूर्वी एशिया के तमाम देश भी प्रभावित हैं। इसलिए इस वार्ता का काफी महत्त्व है। प्रश्न कई हैं। पहला क्या उ. कोरिया इस वार्ता को हजम कर पाएगा? अमेरिका का इतिहास विसनीय नहीं रहा है। लीबिया में अमेरिका ने यही किया था। कर्नल गद्दाफी द्वारा पूरे किए गए वादों के बाद भी अमेरिका ने  किस तरह से लीबिया को बर्बाद किया और गद्दाफी को तिल-तिल कर मार डाला, यह हर कोई जानता है। किम के सामने लीबिया की दास्ता भी याद दिलाई गई होगी।
उ. कोरिया की राजनीति दो अहम सिद्धांतों पर चलती रही है। पहला ‘जूचे’ यानी अति राष्ट्रीयता और दूसरा ‘सोंगम’ अर्थात सैनिक तानाशाही। अगर वार्ता द्वारा इस सिद्धांत को बदला जाता है तो इसके अहम राजनीतिक और आर्थिक परिणाम निकलेंगे। उ. कोरिया में पिछले 70 सालों से किम परिवार राजसत्ता की तरह उत्तर कोरिया में शासन कर रहा है।  दोनों सिद्धांतों पर उ. कोरिया की राजनीतिक व्यवस्था चलती है। उत्तर कोरिया जैसे छोटे देश में कुल सैनिकों की संख्या 92, लाख से ज्यादा है। यह दुनिया की चौथी सबसे बड़ी सेना है, जबकि कुल आबादी महज 2.5 करोड़ है। इतनी बड़ी सेना का भरण पोषण किम जुंग के लिए मुसीबत बनेगी अगर सिद्धांतों में परिवर्तन होता है। चीन इसका अपवाद है। वहां पर साम्यवादी व्यवस्था के रहते हुए सीए पिंग जैसे नेता ने पूंजीवादी सिद्धांत खड़ा कर दिया। क्या जुंग यह सब कर पाएंगे? वार्ता के जरिये अगर कोरियाई एकीकरण की बात आगे बढ़ती है तो दाक्षिण कोरिया के सामने भी कई मुसीबतें पैदा होंगी।
उत्तर कोरिया पिछले कुछ सालों में आर्थिक रूप से पिछड़ा राष्ट्र बन गया है, जिसे एक विफल देश की संज्ञा दी जाती है, वहीं दाक्षिण कोरिया दुनिया की महत्त्वपूर्ण आर्थिक शक्ति है। अगर जर्मनी की तरह दोनों देश एक हो जाते हैं तो मुसीबतें दाक्षिण कोरिया के लिए भारी पड़ेगी। भारत ने सिंगापुर वार्ता का गर्मजोशी के साथ स्वागत किया है। इसमें भारत को कई फायदे दिख रहे हैं।  पहला, अगर उत्तर कोरिया के आणविक हथियारों को खत्म किया जाता है तो इसका फायदा भारत को भी मिलेगा। पाकिस्तान और उत्तर कोरिया के बीच आणविक संबंध को दुनिया जानती है। चीन, उत्तर कोरिया और पाकिस्तान के बीच लकीर खींची गई थी, जिसका एक पहलू आणविक हथियारों की खरीद-फरोख्त भी थी। दूसरा, पिछले महीने भारत के राज्य विदेश मंत्री को उत्तर कोरिया भेजा गया था। अगर शांति वार्ता बहाल होती है तो भारत को एक बड़ा बाजार मिलेगा। तीसरा; इस पूरे परिक्रमा में चीन की अहमियत कमजोर हुई है। अमेरिकी सेना आज भी बड़े पैमाने पर कोरियाई महाद्वीप में स्थित है। संघर्ष की स्थिति में भारत अमेरिका संबंध का दबाव चीन पर होगा। ट्रंप और किम जुंग उन की वार्ता से दुनिया की तस्वीर तो नहीं बदलेगी, मगर एक सकारात्मक पहल होगा, जो सबके लिए फायदेमंद होगा। चीन की स्थिति उत्तर कोरिया को लेकर पहले से ही मजबूत है।
वार्ता के बाद चीन का प्रभाव उत्तर कोरिया पर और बढ़ेगा। नई आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था चीन के तर्ज पर ही तैयार हो सकती है। अमेरिका को भी फायदा है। संभवत: ट्रंप की विदेश नीति की यह सबसे बड़ी जीत होगी। अमेरिका की तकरीबन 28,000 सेना पूर्वी एशिया में तैनात है। उनको वापस बुलाने से अमेरिकी खर्च कम होगा। जापान और दक्षिण कोरिया भी राहत की सांस लेंगे। किंतु सवाल अभी भी गले में हड्डी की तरह अटका हुआ है; क्या यह सब कुछ हो पाएगा?