जाकिर नहीं आएगा

,

यह समाचार निश्चय ही चिंतित करने वाला है कि जाकिर नाइक का इस समय भारत लाया जाना संभव नहीं है। मलयेशिया के प्रधानमंत्री महाथिर मोहम्मद से उसकी मुलाकात की तस्वीरें देखकर हर भारतीय का खून खौल गया होगा। जिस तरह उसके चेहरे पर मुस्कुराहट है, वह सामान्य बात नहीं है।

भारत जैसे दुनिया के प्रभावशाली देश का भगोड़ा अपराधी जानते हुए किसी देश में इस तरह सरकारी मेहमान बनकर आराम और सुकून से रहता रहे, उसके चेहरे पर शिकन तक न हो और भारत कुछ न कर सके इससे पीड़ादायक स्थिति कुछ नहीं हो सकती। महाथिर का बयान है कि वह उसे भारत को प्रत्यर्पित नहीं करेंगे और कि उन्होंने नाइक को अपने यहां स्थायी रूप से रहने की इजाजत दी है।

वस्तुत: भारत ने अपनी ओर से तमाम सबूतों के साथ उसके प्रत्यर्पण की मांग की थी, जिसे मलयेशिया ने पिछले छह जुलाई को ठुकरा दिया था। अभी तक भारत की ओर से इस पर कोई अधिकृत वक्तव्य नहीं आया है। देखना है सरकार इस पर क्या प्रतिक्रिया देती है। प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आखिर, यह नौबत आई क्यों? जब दो वर्ष पूर्व वह देश से बाहर गया था, उस समय तक उसके खिलाफ जांच आरंभ हो चुकी थी। एनआईए चाहती तो उसे रोक सकती थी। न्यायालय से उसका पासपोर्ट जब्त करने तथा देश से बाहर न जाने का आदेश लिया जा सकता था। कोई बाधा नहीं थी।

जाहिर है, यह एक बड़ी चूक थी। वैसे भी एक बार कोई बाहर चला गया तो उसे वापस लाना आसान नहीं होता। जाकिर नाइक की तकरीरों ने उसे पूरे इस्लामी जगत के एक बड़े वर्ग के बीच अपार लोकप्रियता दी है। हर इस्लामी देश में और वैसे दूसरे देशों में जहां-जहां मुसलमान हैं, उनमें भी बड़ा वर्ग उसका घोर समर्थक है।

अनुमान लगाया जाना चाहिए था कि मजहबी प्रचारक के रूप में उसकी ख्याति, संपर्क, सम्मान उसकी वापसी के मार्ग का बड़ा रोड़ा साबित होगा। मलयेशिया उसे शरण नहीं देता तो कोई और देश दे देता। महाथिर पूर्व कार्यकाल के अपने बाद के दिनों में स्वयं इस्लामी कट्टरपंथ के प्रतीक बन चुके थे।

उनके काल में बोया गया कट्टरपंथ का बीज ही आगे चलकर पल्लवित-पुष्पित हुआ। इसलिए उनसे ऐसे किसी व्यक्ति, जिसकी मजहबी प्रचारक के रूप में ख्याति है, और जिसके वहाबी विचारों से वे स्वयं भी परिचित हैं, को वे आसानी से तो भारत को सौंप नहीं सकते। इस तरह भारत के सामने चुनौतियां बढ़ गई हैं।