जनसंख्या दिवस : चैन उड़ाती बढ़ती आबादी

प्रो. आर.बी. सिंह,

प्रतिवर्ष विश्व समुदाय ग्यारह जुलाई को विश्व जनसंख्या दिवस के रूप में मनाता है। यह दिन विश्व के तमाम लोगों को जनसंख्या से संबंधित मुद्दों और समस्याओं के प्रति संकल्पबद्ध होने का अवसर होता है। 1989 में यूनाइटेड नेशंस डवलपमेंट प्रोग्राम की गर्वनिंग काउंसिल ने सिफारिश की थी कि प्रति वर्ष ग्यारह जुलाई को विश्व जनसंख्या दिवस के रूप में मनाया जाना चाहिए। इस पहल के प्रथम वर्ष में ही विश्व के करीब 90 देशों ने शिरकत की  थी। इस बार  आयोजन की थीम है, परिवार नियोजन मानवाधिकार है। भारत परिवार कल्याण कार्यक्रमों में 1952 से ही अग्रणी भूमिका में रहा है। 2018 के आंकड़ों के मुताबिक, भारत विश्व का दूसरा सर्वाधिक जनसंख्या (करीब 135 करोड़) वाला देश है। चीन पहले स्थान पर है। भारत के बाद क्रमश: अमेरिका, इंडोनेशिया, ब्राजील, पाकिस्तान, नाइजीरिया, बांग्लादेश, रूस और जापान का स्थान है।
भारत की आबादी में करीब 32 प्रतिशत लोग शहरी (2016 में 429,802,441) हैं। 1991 तक उत्तर-पूर्व क्षेत्र में सबसे कम जनसंख्या घनत्व था, जबकि दक्षिणी क्षेत्र में सर्वाधिक था।  तदोपरांत पूर्वी क्षेत्र देश में सर्वाधिक जनसंख्या वाले क्षेत्र के रूप में उभरा। 2001-2011 के दशक में जनसंख्या वृद्धि की दर 17.6 प्रतिशत थी, जबकि 1971-81 में 25 प्रतिशत थी। स्वास्थ्य मानव विकास का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ने से पिछले कुछ दशकों में संक्रामक रोगों में कमी आई है। लोगों के  स्वास्थ्य में सुधार और मृत्यु दर में गिरावट दर्ज की गई है। आईसीएमआर की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक गैर-संक्रामक रोग खासे बढ़े हैं। बाल मृत्यु दर में वृद्धि चुनौती बनी हुई है।
जीवन प्रत्याशा बढ़ी है। आजादी के समय यह 40 वर्ष से कम थी, जो बढ़कर 68.5 वर्ष (2016 में) हो गई है। पुरुषों के मामले में यह 67.3 वषर्, जबकि महिलाओं में 69.8 वर्ष है। इस प्रकार मानवीय स्वास्थ्य मानवाधिकारों से बेहद करीबी से जुड़ा मसला है। भारत विश्व का सर्वाधिक युवा देश है। यहां की जनसंख्या में 10-24 वर्ष के आयु वर्ग में 35 करोड़ साठ लाख लोग हैं। जनसंख्या दिवस के मौके पर हमें युवाओं का स्वस्थ भारत के निर्माण खासकर परिवार नियोजन मानवाधिकार है, थीम को रूपाकार करने के लिए ज्यादा से ज्यादा उपयोग के प्रति संकल्पबद्ध होना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी युवा जनसंख्या को देश की पूंजी बनाने की दिशा में प्रयासरत हैं। देश की कुल जनसंख्या का 46 प्रतिशत हिस्सा 24 वर्ष से कम आयु वर्ग के लोगों का है। जरूरी है कि युवा जनसंख्या को कार्यबल की मुख्यधारा में लाने की पहल की जाए ताकि वह देश के लिए महत्त्वपूर्ण संसाधन साबित हो सके। इस दिशा में मेक इन इंडिया, स्किल्ड इंडिया, स्टार्ट-अप, स्टैंड-अप इंडिया आदि विभिन्न विकासात्मक योजनाएं क्रियान्वित की जा रही हैं। अल्पविकास अनेक रूपों में दिखलाई पड़ता है। बाल श्रम, महिलाओं के विरुद्ध हिंसा और उनका यौन शोषण जैसी कुछेक समस्याएं हैं। बाल श्रम की जहां तक बात है, तो इस समस्या से तीन तरह से निपटा जा सकता है। संकटग्रस्त परिवार को आर्थिक समर्थन मुहैया कराया जाए, समूची शिक्षा प्रणाली को चाक-चौबंद किया जाए।
स्लम इलाकों में सामाजिक-आर्थिक स्थितियां खराब होने के चलते बच्चों को पैसा कमाने के लिए बालपन में ही जूझना पड़ जाता है। किशोर वय की लड़कियों को समाजगत परेशानियों तथा विवाह के लिए दान-दहेज आदि के लिए पैसा  जुटाने में माता-पिता की आर्थिक मदद करने की चुनौतियां से जूझना पड़ता है। इस क्रम में वे स्कूल तक नहीं जा पातीं। बालपन में विवाह कर दिए जाने से लड़कियों को स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। उनके मामले में घरेलू हिंसा, मातृ तथा शिशु मृत्यु की आशंका पैदा हो जाती है। महिला सशक्तिकरण जरूरी है। यदि महिलाओं का किशोरवय में सशक्तिकरण किया जाए तो वे सफलता के सोपान चढ़ सकती हैं। अपने समुदायों में सकारात्मक बदलाव ला सकती हैं। भारत और 178 देशों ने 1994 में काहिरा इंटरनेशनल कांफ्रेंस ऑन पॉप्युलेशन एंड डवलपमेंट में इस बात पर बल दिया था कि स्वैच्छिक परिवार नियोजन का प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार है। भारत समेत विकासशील देशों में 21 करोड़ पचास लाख महिलाएं हैं, जो बच्चे को जन्म देने में विलंब करने की इच्छुक हैं, या गर्भधारण नहीं चाहतीं। लेकिन इस बाबत अधिकारों का आधुनिक गर्भनिरोधकों की जानकारी के अभाव में इस्तेमाल नहीं कर पातीं।
भारत के लिए यह कोई उत्साहजनक स्थिति नहीं है कि अभी भी उसकी जनसंख्या वृद्धि दर ऊंची है। ग्रामीण इलाकों में अभी भी बच्चों को आजीविक अर्जित करने में सहायक परिजन के रूप में माना जाता है। ज्यादा बच्चे पैदा करके मां-बाप अपनी वृद्धावस्था की ‘असहायता’ से बचे रहना चाहते हैं। भारत का विश्व के कुल क्षेत्रफल में 2.4 प्रतिशत हिस्सा है, जबकि विश्व की कुल जनसंख्या में उसका 17.84 प्रतिशत हिस्सा है। विश्व  में किसानों की कुल संख्या का 15 प्रतिशत भारत में हैं। विश्व में कुल वन क्षेत्र का आधा प्रतिशत भारत में है। ताजे जल का मात्र 4 प्रतिशत भारत में उपलब्ध  है। इसलिए भारत में जनसंख्या-संसाधन अनुपात असंतुलित है। जनसंख्या बढ़ने का अर्थ है संसाधनों का कम पड़ते जाना। फलस्वरूप समाज में तनाव पैदा होने की आशंका उठ खड़ी होती है। इसलिए जरूरी है कि युवा जनसंख्या को स्किल इंडिया, मेक इन इंडिया, स्टार्ट-अप इंडिया के माध्यम से प्रशिक्षित किया जाए ताकि देश को गुणवत्तापूर्ण संसाधन उपलब्ध हो सकें। जरूरी है कि पारंपरिक पाठय़क्रमों के स्थान पर खाद्य एवं पोषण सुरक्षा, जल सुरक्षा, जलवायु सुरक्षा, जैव विविधता, आपदा प्रबंधन, लैंगिक एवं मानवीय स्वास्थ्य जैसे विषयों संबंधी पाठय़क्रमों पर केंद्रित हुआ जाए।
भारत के लिए जरूरी है कि स्वास्थ्य, शिक्षा तथा कौशल विकास जैसे क्षेत्रों में खासा निवेश किया जाए। खासकर युवाओं की संख्या का ज्यादा से ज्यादा फायदा उठाने के लिए इस दिशा में प्रयास किए जाने जरूरी है। दक्षिण कोरिया, जापान, सिंगापुर तथा मलयेशिया जैसे देशों ने इस दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है। जहां तक भारत की बात है कि स्वास्थ्य तथा परिवार नियोजन के लिए जीडीपी का मात्र 1.3 प्रतिशत व्यय किया जाता है। युवा शक्ति की उपेक्षा से सामाजिक असंतोष का खतरा है।