छात्र संघ चुनाव : राजनीतिक विसंगतियों की गिरफ्त में

डॉ. नवल किशोर,

विद्यार्थियों के व्यक्तित्व के सर्वागीण विकास के लिए विश्वविद्यालय परिसर एक प्रयोगशाला के रूप में कार्य करता है। इसलिए पाठय़क्रम के साथ-साथ अतिरिक्त पाठय़क्रम संबंधी गतिविधियां भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण हैं। यही कारण है कि विद्यार्थी शैक्षणिक विकास के साथ-साथ सामाजिक और राजनैतिक भूमिका के योग्य बन पाते हैं। छात्र संघ का चुनाव विद्यार्थियों के लिए राजनीतिक होने का प्राथमिक मंच होता है, जहां राजनीतिककरण और नेतृत्व क्षमता के प्रयोग की सीख मिलती है।
सबसे युवा मतदाता के रूप में भी मतदान प्रयोग का शायद यह पहला अवसर होता है। युवा  ऊर्जा, उमंग और आदर्शवादी सोच से भरपूर तो होता है, लेकिन उसमें अनुभव की कमी भी होती है। जाहिर है कि ऐसे में राजनैतिक परिपक्वता भी प्रभावित होगी। ऐसी स्थिति में छात्र संघ चुनाव के परिप्रेक्ष्य में विद्यार्थियों की भागीदारी और भूमिका  काफी चुनौतीपूर्ण दिखती है। जैसा कि हम जानते हैं कि दिल्ली विश्वविद्यालय देश का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय है, इसलिए यहां पर सबसे बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं को दाखिला मिलता है। यह भी सत्य है कि दाखिला प्राप्त आवेदकों मे से अधिकतर दिल्ली के निवासी होते हैं। हालांकि आसपास के राज्यों से आने वाले विद्यार्थियों की संख्या भी चुनाव की दृष्टि से निर्णायक साबित होती है।  
आम तौर पर विद्यार्थियों के हितों को स्पष्ट करने की जिम्मेदारी छात्र संघ की होती है, और एक हित समूह या दबाव समूह के रूप मे उसे हासिल करना भी उसी का  दायित्व है। छात्र संघ के विभिन्न पदों के लिए हर वर्ष चुनाव होता है। दिल्ली विश्वविद्यालय में इसकी परंपरा 1954 में शुरू हुई थी। समय के साथ इस छात्र संघ चुनाव का राजनीतिकरण हुआ और भारतीय चुनावी राजनीति की सभी विसंगतियों से यह चुनाव भी लिप्त होता गया। धन बल, सत्ता और जातिगत आधार पर चुनाव में हार-जीत का सिलसिला शुरू हुआ। फलस्वरूप, छात्र हितों के मुद्दे  चुनावी घोषणा-पत्रों तक सिमट कर रह गए। राजनीतिक दलों के प्रत्यक्ष हस्तक्षेप ने छात्र संघ चुनावों की प्राथमिकताओं को बुरी तरह प्रभावित किया है। छात्र संघ के उम्मीदवारों के लिए छात्र हित से ज्यादा राष्ट्रीय राजनीति आकर्षित करने वाली हो गई, और छात्र संघ चुनाव उसे हासिल करने का एक माध्यम बन कर रह गया है। इस वर्ष का छात्र संघ चुनाव भी इन्हीं बिंदुओं को ही परिलक्षित करता दिख रहा है।
एबीवीपी और एनएसयूआई के अलावा सीवाईएसएस-आइसा के चुनाव मैदान में आने से इस बार त्रिकोणीय संघर्ष की संभावना तो बन गई है किन्तु वैकल्पिक छात्र राजनीति की कोई संभावना दूर-दूर तक नजर नहीं आ रही है। तीनों राजनीतिक दलों ने जातीय समीकरण को ध्यान में रखते हुए ज्यादातर गुर्जर-जाट समुदाय के छात्रों को ही उम्मीदवार बनाया है।  छात्र संघ के विजयी उम्मीदवार चुनाव जीतने के पश्चात पूर्ण रूप से अपनी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा की पूर्ति के प्रयास में लग जाते हैं। छात्र संघ में सवा लाख से ज्यादा छात्र-छात्राएं मतदाता हैं, लेकिन पचास फीसद से भी कम लोग चुनाव प्रक्रिया में हिस्सा लेते हैं। छात्र-केंद्रित मुद्दों के प्रति रुझान में कमी मात्र प्रतिनिधि स्तर पर ही नहीं, बल्कि जनमत की सहभागिता से भी ऐसा ही भान होता है।
पिछले दो दशकों में डीयू छात्र संघ के तरफ से फीस बढ़ोतरी, छात्रावास या अन्य सुविधाओं को लेकर कोई बड़ा अभियान नहीं देखा गया है। शिक्षा पर खर्च में बजट कट हो या सेमेस्टर प्रणाली जैसी विद्यार्थी विरोधी पहल के खिलाफ आंदोलन, इनका नेतृत्व डीयू शिक्षक संघ ने किया और छात्र-छात्राओं को जागरूक किया और आंदोलन में सहयोग लिया। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर विमर्श में भी छात्र संघ की कोई खास उपस्थिति नहीं होती। छात्र संघ के चुनाव के प्रचार तंत्र के अध्ययन से भी ज्ञात होता है कि उम्मीदवार नहीं, बल्कि राजनीतिक दल ही चुनाव लड़ते हैं। उम्मीदवारों के बीच बहस की कोई परंपरा नहीं है। खर्च भी सीमा से कई गुणा ज्यादा होता है। राजनीतिक दलों के नेताओं की चुनाव प्रबंधन में प्रत्यक्ष भागीदारी होती है। दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव के इन पहलुओं को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि छात्र मतदाताओं के मतदान से सिर्फ राजनेता ही निकल कर आते हैं, जो किसी-न-किसी राजनीतिक दल के लिए समर्पित होते हैं। छात्र-छात्राओं से जुड़े सवाल हर चुनाव में दोहराए जाते होंगे।