चुनाव ही विकल्प

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जम्मू-कश्मीर में करीब साढ़े तीन साल तक नोंक-झोंक और आपसी तनातनी के साथ सरकार चलाने के बाद भाजपा और पीडीपी का बेमेल गठबंधन आखिर टूट गया। पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद सूबे में संवैधानिक संकट पैदा हो गया है, क्योंकि मौजूदा राजनीतिक समीकरण में किसी लोकप्रिय सरकार के गठन की संभावना दिखाई नहीं देती।

कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस दोनों ने किसी भी प्रकार के गठबंधन की संभावनाओं को खारिज कर दिया है, लिहाजा आतंकवाद से ग्रसित यह सूबा गवर्नर शासन की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। नवम्बर-दिसम्बर दो हजार चौदह में विधानसभा की सतासी सीटों के लिए यहां चुनाव हुए थे। अठाइस सीटें जीतकर पीडीपी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी।

पचीस सीटों के साथ भाजपा दूसरी बड़ी पार्टी थी। नेशनल कांफ्रेंस को पंद्रह, कांग्रेस को बारह और अन्य के खाते में सात सीटें आई थी। परस्पर विरोधी विचारों वाली पीडीपी और भाजपा ने जब मिलकर सरकार चलाने का फैसला किया था, उसी समय इसके भविष्य को लेकर सवाल खड़े होने लगे थे।

हालांकि राजनीतिक दृष्टि से भाजपा का यह फैसला उचित और दूरदृष्टिपूर्ण था। भाजपा के लिए घाटी के लोगों का दिल जीतकर उन्हें देश की मुख्यधारा से जोड़ने का सुनहरा अवसर था, मगर इस दिशा में वह एक कदम भी आगे नहीं बढ़ पाई। अगर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नेतृत्व वाली केंद्र सरकार अटल बिहारी वाजपेयी की कश्मीर नीति को आगे बढ़ाती तो घाटी में शांति बहाल हो सकती थी। लेकिन साढ़े तीन साल के शासन में भाजपा  और पीडीपी के संबंध कभी अच्छे नहीं रहे, जिसकी वजह से सूबे में आतंकवादियों और अलगाववादियों का मनोबल बढ़ता गया और हिंसा की घटनाओं में लगातार बढ़ोतरी होती रही।

भाजपा ने गठबंधन से अलग होने की पहल की है, लेकिन इसका नुकसान भाजपा को होगा जबकि राजनीतिक फायदा पीडीपी को मिलेगा। वह राज्य की जनता को यह संदेश देने से पीछे नहीं हटेगी कि भाजपा ने गठबंधन धर्म का पालन नहीं किया। आने वाले दिनों में यदि गवर्नर शासन लागू होता है तो राज्य में भले शांति स्थापित हो जाए, किंतु राजनीतिक प्रक्रिया थम जाएगी, जिससे लोकतंत्र को धक्का पहुंचेगा। अगर किसी लोकप्रिय सरकार के गठन की संभावना दिखाई नहीं देती तो जल्द-से-जल्द चुनाव कराने के सिवाय कोई बेहतर विकल्प दिखाई नहीं देता।