चमक के पीछे अंधेरा

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एशियन  इन्फ्रास्ट्रक्चर इनवेस्टमेंट बैंक यानी एआईआईबी के तीसरी सालाना बैठक में मुंबई में पीएम मोदी ने जो कहा-उसका आशय है कि भारत की अर्थव्यवस्था एक चमकदार स्थिति में और भारत पूरी दुनिया के विकास का इंजन है। पीएम मोदी को लगातार सुना जाये, तो ऐसा प्रतीत होने लग सकता है कि भारत भूमि स्वर्ग हो गयी और दुनिया का श्रेष्ठतम दौर भारत में इस वक्त चल रहा है। पर ऐसा मान लेना सरलीकरण होगा। और हमें खुद को यह याद दिलाते रहना होगा कि स्थितियां जटिल हैं।

अगर भारतीय अर्थव्यवस्था चमक रही है, तो यह चमक भी उस चमक जैसी है, जैसी किसी रईस की बारात में गैस का हंडे की चमक होती है। बारात में गैस के चमकदार हंडे को अपने ऊपर लादे हुए मजदूर की सही हालत उसके कपड़ों से साफ होती है, उसकी हालत से साफ होती है न कि हंडे की चमक से। जब पीएम मोदी चमक की बात कर रहे हैं तो ठीक इसी वक्त तीन समस्याएं हमारे सामने हैं जिनका त्वरित और सार्थक निराकरण जरूरी है, तब ही भारत सही मायनों में विश्व का आर्थिक इंजन बन पायेगा। पहला मसला सरकारी बैंकों का है।

जो रिपोर्टे लगातार रोज आ रही हैं, उनसे साफ होता है कि सरकारी बैंकों की वास्तविक हालत बहुत खराब है। और उनसे निपटारे के लिए सरकार के पास जो कदम हैं, वे निहायत ही अप्रभावी हैं। अब जैसे आईडीबीआई बैंक को एलआईसी को बेचकर आईडीबीआई बैंक की हालत सुधारने का प्रयास एकदम निर्थक है।

इस कदम से सरकार को कुछ करोड़ रु पये मिल सकते हैं पर डूबते आईडीबीआई बैंक की कार्य संस्कृति और स्थिति में कोई सकारात्मक असर आने के आसार नहीं हैं। दूसरा बड़ा मसला कृषि का है, प्रधानमंत्री 2014 के चुनावी भाषणों में खूब जमकर घोषणा करते थे कि उनके शासन में अन्नदाताओं की हालत में सुधार होगा। पर उनकी ज्यादातर बातें अभी भी बातों के स्तर पर ही  हैं। देश के लगभग हर कोने से उठ रहे किसान आंदोलनों से यह बात साफ होती है। तीसरा मसला है कि जीएसटी के एक साल पूरे होने पर यह साफ हो रहा है कि छोटे कारोबारियों को जीएसटी ने ध्वस्त कर दिया है।

कई छोटे कारोबारियों को जीएसटी की जटिलताओं ने खत्म कर दिया है। इन सारी समस्याओं के रहते प्रधानमंत्री चमकदार स्थिति की बात भले ही कर लें, पर उन्हें गंभीरता से लिया जाना संदिग्ध ही रहेगा। जरूरी है कि पीएम इस सरकार के आखिरी के कुछ महीनों में अर्थव्यवस्था की वास्तविक चुनौतियों से सार्थक तरीके से जूझते दिखें।