घाटी में सियासी दांव-पेच

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ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि जम्मू-कश्मीर में नई सरकार के गठन की कवायद शुरू हो गई है, हालांकि सूबे की दलीय और राजनीतिक स्थिति, दोनों जोड़-तोड़ और गठजोड़ वाली किसी नई सरकार के बजाय नये जनादेश की मांग कर रही हैं। दरअसल, निहित स्वाथरे से प्रेरित गठजोड़ वाली नई सरकार न तो घाटी में शांति बहाल कर पाएगी और न ही स्थायित्व दे पाएगी। वास्तविकता तो यह है कि पीडीपी भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने के कारण अपने समर्थकों के बीच राजनीतिक वैधता खो चुकी है। महबूबा मुफ्ती को अपनी पार्टी का अस्तित्व बचाए रखने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।

पीडीपी के पांच विधायकों ने उनके खिलाफ भाई-भतीजावाद की राजनीति करने का आरोप लगाकर नया संकट खड़ा कर दिया है। पार्टी में विद्रोह का नेतृत्व शिया नेता इमरान रजा अंसारी कर रहे हैं। वह पीडीपी-बीजेपी गठबंधन सरकार में मंत्री थे। माना जाता है कि चार विधानसभा क्षेत्रों में उनका अच्छा-खासा प्रभाव है। दिलचस्प बात तो यह है कि उन्होंने पीडीपी-बीजेपी गठबंधन टूटने के लिए बीजेपी को नहीं, अपनी ही पार्टी को दोषी ठहराया है। उनका यह विचार राजनीतिक दृष्टि से बड़ा महत्त्वपूर्ण है, और इससे बीजेपी के साथ उनकी निकटता का पता चलता है।

महबूबा अपनी पार्टी को एकजुट रखने के लिए कांग्रेस के साथ मिलकर नई सरकार बनाने की कवायद में जुटी हुई है। सूबे की मौजूदा राजनीतिक स्थिति में कांग्रेस की स्थिति बेहद अहम हो गई है। जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दरजा प्राप्त है। वहां विधानसभा का कार्यकाल छह वर्ष का है अर्थात 2020 में वहां चुनाव होने हैं। इसलिए राजनीतिक नफा-नुकसान का आकलन करके कांग्रेस पीडीपी के साथ मिलकर सरकार बनाने के बारे में कोई फैसला कर सकती है। दूसरी ओर, भाजपा भी नई सरकार बनाने की दौड़ में शामिल है। सूबे में पीडीपी के बाद बीजेपी के पास विधासभा की सबसे अधिक सीटें हैं।

सत्तासी सदस्यों वाली विधानसभा में बीजेपी के पच्चीस विधायक हैं। सरकार बनाने के लिए उन्नीस विधायक जरूरी हैं। पीडीपी के असंतुष्ट विधायकों और निर्दलीय सदस्यों को मिलाकर वह सरकार बनाने का सपना देख रही है। हालांकि बीजेपी की सरकार बनने की संभावना कम ही दिखाई दे रही है। सरकार किसी की भी बनेगी वह स्थायी नहीं हो सकती। लिहाजा, चुनाव ही अंतिम विकल्प है।