गुज्जर-बक्करवाल : जंगल से बेदखली का अंदेशा

अजय अधाना,

कश्मीर के कठुआ में आठ साल की बच्ची के साथ रेप और उसकी हत्या पर समूचे देश में गुस्सा और आक्रोश है। मुस्लिम बक्करवाल समुदाय की लड़की जंगल में घोड़े चराने गई थी, जहां उसके साथ अपराध किया गया। बताया गया है कि इस खानाबदोश समुदाय को क्षश्वेत्र से बाहर करने के लिए वारदात की गई। दरअसल, अनेक मुद्दों को लेकर राज्य के अनेक हिस्सों खासकर जम्मू क्षश्वेत्र में तमाम विरोध प्रदर्शन हाल के दिनों में हुए हैं। राज्य सरकार द्वारा वन भूमि पर गुज्जर-बक्करवाल समुदाय को अधिकार दिए जाने के बारे में कोई फैसला न करने की मांग को लेकर  स्थानीय लोग लामबंद हो गए हैं। उन्हें लगता है कि फैसले से इस क्षश्वेत्र में जनसंख्या का संतुलन डगमगा जाएगा।
गुज्जर-बक्करवाल समुदायों की आबादी जम्मू-कश्मीर की जनसंख्या का ग्यारह प्रतिशत है। राज्य में ये पशुपालक समुदाय सबसे बड़ा मुस्लिम समूह हैं। 1991 में उन्हें अनुसूचित जनजाति का दरजा दिया गया था। गुज्जर दूध के कारोबार में हैं, और जम्मू के अनेक स्थानों पर चिनाब घाटी तक बसे हुए हैं। भेड़-बकरी पालने वाला बक्करवाल भी खानाबदोश समुदाय है, जो गर्मियों में भेड़-बकरियों के अपने रेवड़ों के साथ कश्मीर और लद्दाख की ऊंचाइयों पर चला जाता है, और सर्दियों में जम्मू के जंगलों में डेरा डाल दश्वेता है। सदियों से ऐसा ही चला आ रहा है।

हाल के समय में राज्य की पीडीपी-भाजपा सरकार ने सरकारी भूमि और वन भूमि पर अवैध कब्जा हटाने अभियान चलाया। इससे इन समुदायों में भय व्याप्त गया है कि कहीं परंपरा से चले आ रहे उनके अधिकार न छीन लिये जाएं? उनकी शंका और बढ़ गई जब उन्होंने हाल तक वन मंत्री रहे चौ. लाल सिंह का बयान सुना। लाल सिंह ने कहा था कि वन भूमि को ‘अतिक्रमण’ मुक्त कराया जाएगा। वन भूमि पर खश्वेती करने पर प्रतिबंध लगाया जाएगा।

इस पर बक्करवाल और गुज्जर समुदायों ने मांग की कि केंद्रीय वन अधिकार अधिनियम, 2006 को जम्मू-कश्मीर में भी लागू किया जाए। अनुच्छेद 370 के अलावा इन समुदायों से जुड़े इस मुद्दे को भी भाजपा महत्त्वपूर्ण मानती है। चूंकि दोनों समुदाय मुस्लिम हैं, इसलिए जम्मू क्षश्वेत्र के स्थानीय निवासियों को डर है कि कहीं क्षश्वेत्र की जनसंख्या का स्वरूप ही न बदल जाए। दूसरी तरफ पीडीपी इन समुदायों को अपना बड़ा जनाधार मानती है। इस साल के शुरू में महबूबा सरकार ने कहा था कि वह जनजातीय नीति लाएगी। उसके बाद जनजातीय मामलों के मंत्रालय की बैठक भी हुई। इसके बाद एकाएक सोशल मीडिया पर आग की तरह ‘खबर’ फैल गई कि ‘ऐतिहासिक फैसला’ कर लिया गया है, और जम्मू-कश्मीर की खानाबदोश आबादी को ‘राहत’ प्रदान की जाएगी। उन्हें वन भूमि से बेदखल नहीं किया जाएगा। इसके बाद जम्मू क्षश्वेत्र में अफवाह फैला दी गई कि जम्मू क्षश्वेत्र में महबूबा सरकार ‘कश्मीर-केंद्रित एजेंडा’ लागू करने जा रही है। हालांकि राज्य सरकार ने इस समूचे प्रकरण पर कुछ नहीं कहा। लेकिन विवाद पैदा हो चुका था। इस कारण राज्य के वन राज्य मंत्री अजय नंदा को स्पष्टीकरण देना पड़ा कि इस प्रकार का कोई फैसला नहीं हुआ है। तो सवाल उठता है कि  इस मुद्दे को लेकर तमाम प्रदर्शनों का सबब क्या है?

दरअसल, जम्मू-कश्मीर ऐसा राज्य है, जहां हिन्दू और मुस्लिम, दोनों सरकार की मंशा भांपने में तल्लीन रहते आए हैं। हर सरकारी फैसले का इस हिसाब से जांचा-परखा जाता है कि किस समुदाय के हित साधने की कोशिश हो रही है। इसलिए हिन्दुओं को यकीन नहीं हो रहा कि ऐसा कोई फैसला नहीं हुआ है। वे तमाम शंका-आशंकाओं से घिरे हुए हैं। दूसरी तरफ, गुज्जर-बक्करवाल समुदायों का कहना है कि उन्हें वन भूमि से खदेड़े जाने के पीछे यह गलत धारणा काम कर रही है कि उन्होंने बड़े पैमाने पर वन भूमि पर अतिक्रमण कर लिया है। उनका कहना है कि वे देश की आजादी के बाद से ही भारतीय सुरक्षा बलों की मदद में रहते आए हैं।

कश्मीर में माना जाता है कि वे सुरक्षा बलों के आतंकवादियों के खिलाफ अभियानों में कंधे-से-कंधा मिलाकर सुरक्षा बलों के साथ रहते हैं। उनके नश्वेताओं ने सरकार से मांग की है कि इस बाबत श्वेत पत्र जारी किया जाए कि किन लोगों ने वन भूमि और सरकारी भूमि पर कब्जा किया है। ऐसे लोगों की पहचान करके उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। उनका का कहना है कि भूमि कब्जाने वाले रसूखदार लोग हैं, जिनने अधिकारियों से मिलीभगत करके जमीनें कब्जाई। बाद में 1990 के दशक में उग्रवाद के दौरान जम्मू में बाहर से आए लोगों के हाथों इन जमीनों को बेच दिया।