गिरी और वजहों से

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नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार द्वारा विकास दर में गिरावट के जो कारण बताए गए हैं, वे आम धारणा के विपरीत हैं। आम धारणा है कि नोटबंदी के कारण विकास दर में गिरावट आई, क्योंकि इससे अनेक उद्योग एवं कारोबार बुरी तरह प्रभावित हुए। किंतु राजीव कुमार का कहना है कि नोटबंदी के साथ विकास दर में गिरावट का कोई सीधा संबंध नहीं दिखता है, बल्कि इसके लिए भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन की नीतियां इसके लिए जिम्मेवार थीं।

यह बात ठीक है कि रघुराम राजन ने एनपीए की पहचान के लिए जो नीतियां अपनाई उनसे यह बढ़ता चला गया। मोदी सरकार के सत्ता में आने के समय एनपीए का आंकड़ा करीब 4 लाख करोड़ रु पया आंका गया। यह 2017 के मध्य तक साढ़े 10 लाख करोड़ हो गया। इससे बैंकों ने कर्ज देना लगभग बंद कर दिया। मध्यम एवं लघु उद्योगों का क्रेडिट विकास नकारात्मक हो गया और बड़े स्तर के उद्योगों के लिए भी यह 1 से 2.5 प्रतिशत तक गिर गया था। भारतीय अर्थव्यवस्था के इतिहास में बैंकों से उधार में आई यह सबसे बड़ी गिरावट थी।

इसका असर विकास दर पर सीधा होना ही था। राजीव कुमार का यह तर्क पहली नजर में सही दिखाई देता है कि नोटबंदी आने के पूर्व से ही विकास दर में गिरावट आने लगी थी। नोटबंदी के पूर्व छह तिमाही से यह लगातार नीचे जा रही थी। इसकी शुरु आत 2015-16 की दूसरी तिमाही में हुई थी। उस समय विकास दर 9.2 प्रतिशत थी।

इसके बाद हर तिमाही के आंकड़े विकास दर में गिरावट दर्शा रहे हैं। राजीव कुमार का यह बयान पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह एवं पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम के इस आरोप के विपरीत है कि नोटबंदी के कारण देश की अर्थव्यवस्था तबाह हो गई। चूंकि नीति आयोग के उपाध्यक्ष ने इसका आंकड़ों के साथ खंडन किया है; इसलिए इसे एकबारगी खारिज करना मुश्किल होगा।

बावजूद यह स्वीकारना मुश्किल है कि नोटबंदी का-कुछ समय के लिए ही सही-विकास दर पर नकारात्मक असर नहीं हुआ। इस दौरान छोटे उद्योगों एवं कारोबारों को प्रभावित हुए। उत्पादन कम करने पड़े, कर्मचारियों की संख्या घटानी पड़ी..। इसका असर विकास दर पर न हो; यह मानने का कोई कारण नहीं है।

निष्कर्ष यह कि केवल नोटबंदी विकास दर में गिरावट का कारण नहीं थी। अन्य कारण पहले से व्याप्त थे, जिससे गिरावट जारी थी। नोटबंदी इस प्रवृत्ति को कायम रखने की वजह बनी।