गतिरोध खत्म

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पूरी दिल्ली ने राहत की सांस ली है। मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल अपने मंत्रिमंडल के तीन अन्य साथियों के साथ जिस तरह उपराज्यपाल निवास के अंदर धरना पर बैठे थे उससे दिल्ली सरकार ठप हो गई थी। इनके विरुद्ध एक ओर भाजपा धरना और अनशन कर रही थी तो कांग्रेस प्रदशर्न। ऐसा दृश्य किसी राज्य में शायद ही देखा गया हो जब एक साथ सरकार एवं विपक्ष धरना प्रदशर्न पर उतर जाए।

केजरीवाल अभी भी कह रहे हैं कि आईएएस अधिकारियों की हड़ताल तो प्रधानमंत्री के इशारे पर उपराज्यपाल ने करा रखी थी। उन्होंने फोन किया और अधिकारी काम पर आ गए। सच यह है कि आईएएस एसोसिएशन ने जब पत्रकार वार्ता करके अपनी बातें रखीं तो केजरीवाल एवं आम आदमी पार्टी के सामने एक ही विकल्प बचा था कि किसी तरह गतिरोध से निकलने का रास्ता निकाला जाए। केजरीवाल ने अधिकारियों की सुरक्षा एवं उनके सम्मान की रक्षा का वचन देकर अपील जारी की। अधिकारियों ने इसे सकारात्मक तरीके से लिया। अब प्रश्न उठता है कि आखिर, केजरीवाल ने धरना तथा उनके दो मंत्रियों ने अनशन क्यों किया?

वे चाहते तो पहले भी इसका रास्ता निकल सकता था। अधिकारियों के साथ संवाद करने की पहल इन्हें ही करनी थी। अगर इन्होंने पहले ऐसा किया होता तो यह नौबत आती ही नहीं। किंतु केजरीवाल एक चतुर राजनेता हैं। उन्होंने धरना एवं अनशन करके एक साथ जनता की सहानुभूति, कुछ दलों का समर्थन एवं अपना देशव्यापी प्रचार पाने की रणनीति अपनाई।

सहानुभूति के लिए उन्होंने यह आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उनको काम करने नहीं दे रहे, अधिकारियों की हड़ताल उपराज्यपाल के माध्यम से उन्होंने कराई और वे तो जनता के लिए धरना और अनशन कर रहे हैं। यह सच नहीं था, फिर भी वे बार-बार यही कहते रहे। इससे पूरे देश में कई दिनों तक इनकी ही चर्चा चलती रही। केजरीवाल के पक्ष एवं विपक्ष में जनता तथा मीडिया में बहस होती रही। इसका प्रभाव इतना हुआ कि चार मुख्यमंत्री खुलकर उनके पक्ष में आ गए।

कई राजनीतिक दलों के नेताओं ने उनके पक्ष में बयान दिए। अगर केजरीवाल शांति से समझौता कर लेते तो यह सब नहीं होता। निश्चय ही केजरीवाल और उनके साथी इससे प्रसन्न होंगे कि उनकी रणनीति सफल रही। उनकी नाकामयाबी पर चर्चा इतने दिनों बंद रही। किंतु जिन लोगों में अब भी केजरीवाल से नैतिक एवं आदर्श राजनीति की उम्मीद बची थी, उन्हें एक बार पुन: धक्का लगा है।