खुशहाली के लिए एक-दूसरे के प्रयासों के पूरक बनें बिम्स्टेक देश : मोदी

भाषा, काठमांडो

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बृहस्पतिवार को कहा कि बिम्स्टेक के सदस्य देशों के बीच केवल राजनयिक संबंध ही नहीं है बल्कि यह संस्कृति तथा सभ्यता के अटूट बंधनों से बंधे हैं और इसी परंपरा पर आगे बढ़ते हुए उन्हें एक-दूसरे के प्रयासों का पूरक बनना होगा क्योंकि परस्पर जुड़ी दुनिया में कोई भी देश अकेले विकास, शांति और समृद्धि हासिल नहीं कर सकता।
मोदी ने यहां चौथे बिम्स्टेक सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में अपनी आरंभिक टिप्पणी में कहा, इस क्षेत्र के सभी देशों के साथ भारत के सिर्फ राजनयिक संबंध नहीं है। हम सभी देश सदियों से सभ्यता, इतिहास, कला, भाषा, खान-पान और हमारे साझा संस्कृति के अटूट बंधनों से जुड़े हुए हैं। हमें एक साथ चलना है। हम सभी विकासशील देश हैं और शांति, समृद्धि और खुशहाली हमारी प्राथमिकता है लेकिन आज की परस्पर जुड़ी दुनिया में यह अकेले हासिल नहीं किया जा सकता। हमें एक-दूसरे के साथ चलना है, एक-दूसरे का सहारा बनना हैं, एक-दूसरे के प्रयासों का पूरक बनना है। मैं मानता हूं कि सबसे बड़ा अवसर है। उन्होंने कहा, बिम्स्टेक क्षेा के एक ओर महान हिमालय पर्वत श्रंखला है और दूसरी ओर हिन्द और प्रशांत महासागरों के बीच स्थित बंगाल की खाड़ी। बंगाल की खाड़ी का  सभी के विकास, सुरक्षा और प्रगति के लिए विशेष महत्व रखता है। भारत की विदेश नीति के दो महत्वपूर्ण कार्यक्रमों ‘नेबरहुड फस्र्ट’ और ‘एक्ट ईस्ट’ संगम इसी बंगाल की खाड़ी के क्षेा में होता है जिसका उद्देश्य समूचे क्षेत्र का चहुमुखी विकास करना है।
मोदी ने कहा, संपर्क को व्यापक दायरे में देखा जाना चाहिए और इसमें व्यापार, आर्थिक, यातायात और डिजिटल संपर्क के साथ-साथ, लोगों के बीच संपर्क सभी का ध्येय होना चाहिए। इस संदर्भ में उन्होंने कहा कि बिम्स्टेक तटीय नौवहन समझौते और बिम्स्टेक मोटर यान समझौते को अमली जामा पहनाये जाने की जरूरत है। बिम्स्टेक देशों के बीच विकास, शांति और समृद्धि के प्रति वचनबद्धता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा, भारत बिम्स्टेक को मजबूत क्षेीय समूह बनाने के लिए ‘भारत बिम्स्टेक स्टाई अप सम्मिट‘आयोजित करने को तैयार है।

बिम्स्टेक क्या है

- दबिम्स्टेक अर्थात ‘बे ऑफ बंगाल इनिशिएटिव फॉर सेक्टोरल टेक्नीकल एंड इकॉनोमिक को-ऑपरेशन’ 6 जून 1997 को बैंकाक घोषणा के माध्यम से अस्तित्व में आया था।

- बांग्लादेश, भूटान, भारत, म्यांमार, नेपाल, श्रीलंका और थाईलैंड जैसे  सात देश इसके सदस्य हैं।