कोर्ट की खरी-खरी

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सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण संरक्षण और जन कल्याण के लिए बनाए गए कोष के अन्यत्र इस्तेमाल पर केंद्र सरकार के खिलाफ जिस तरह की तल्ख टिप्पणी की है, उससे राज्य के दो महत्त्वपूर्ण स्तंभों के पारस्परिक रिश्तों में वर्षो से घुली कड़वाहट ही जाहिर हुई है।

आजादी के बाद विशेषकर इंदिरा गांधी के जमाने में इन दोनों स्तंभों के बीच अपनी-अपनी सर्वोच्चता स्थापित करने के लिए एक लंबा संघर्ष हुआ था, जो इतिहास में दर्ज है। इस टकराव और संघर्ष में अंतत: कार्यपालिका की सर्वोच्चता स्थापित हुई, लेकिन उसके बाद के दिनों में भी न्यायपालिका ने कुछ ऐसे फैसले दिए हैं, जो न्यायिक सक्रियता के दायरे में आते हैं।

हाल के दिनों में भी कई अवसरों पर कार्यपालिका ने न्यायपालिका पर अपनी सीमा का अतिक्रमण करने का आरोप लगाया है। यह ठीक है कि लेकतंत्र में लोकप्रिय सरकार सबसे अहम स्थान रखती है क्योंकि उसे जनता निर्वाचित करती है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि निष्पक्ष और स्वतंत्र न्यायपालिका को कमजोर करने की कोई भी कोशिश लोकतंत्र की आत्मा को कमजोर करना होगा।

इसी विचार को केंद्र में रखकर हमारे संविधान निर्माताओं ने न्यायपालिका की निष्पक्षता और स्वतंत्रता को बहाल रखने के लिए संविधान में प्रावधान भी किए हैं। इतना ही नहीं, संविधान में दोनों स्तंभों की शक्तियों और कार्यों का स्पष्टत: विभाजन भी है। अगर दोनों स्तंभ अपनी-अपनी सीमाओं में रहकर अपना काम करें तो कहने की जरूरत नहीं कि टकराव की कोई गुंजाइश भी है।

लेकिन यह विडंबनापूर्ण है कि सरकार के अधीनस्थ अधिकारी अपने दायित्वों का निर्वाह ठीक से नहीं करते जिसके कारण न्यायपालिका को अनावश्यक और अतिरिक्त दबाव झेलना पड़ रहा है। दोनों स्तंभों के बीच इस ताजा प्रसंग में शीर्ष अदालत को यह कहना पड़ा कि अधिकारी काम नहीं करते और कार्यपालिका हमें मूर्ख बना रही है।

आखिर, पर्यावरण संरक्षण जैसे गंभीर मसले के लिए बनाए गए कोष का इस्तेमाल सड़कें बनाने और स्ट्रीट लाइटें लगाने में किया जाए तो भला इसे सुप्रीम कोर्ट कैसे जायज ठहरा सकता है। उल्लेखनीय है कि शीर्ष अदालत के आदेश से ही इस कोष के लिए करीब एक लाख करोड़ रुपये की धनराशि जुटाई गई है। दरअसल, सच तो यह है कि हाल के कुछ वर्षो में सरकार की विसनीयता सतत कम हुई है, लेकिन न्यायपालिका की प्रतिष्ठा उत्तरोत्तर बढ़ी है। ऐसा क्यों हो रहा है, यकीनन यह विचारणीय प्रश्न है।