कैसे आएगा अमन?

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अमन और शांति के पर्व ईद पर जिस तरह पाकिस्तान के पैसों पर पलने वाले पत्थरबाज गैंग ने अपनी कायराना और दोयम दरजे की मानसिकता का परिचय दिया है, उसे पूरे देश ने देखा। राज्य में अमन बहाली के वास्ते सरकार ने जिस मंशा के साथ एक माह के सीजफायर का एकतरफा फैसला लिया, उसका सम्मान न तो पाकिस्तान ने किया, न अलगाववादियों ने और न वहां के मुट्ठी भर पत्थरबाजों ने।

इस एक माह के दौरान सेना और सुरक्षाबलों पर हमले लगातार होते रहे। इस दौरान बीएसएफ और सेना के कई जवान शहीद भी हुए। शांति और संवाद की हिमायत करने वाले वरिष्ठ पत्रकार शुजाअत बुखारी की हत्या कर दी गई। अनंतनाग और पुलवामा में सेना के कैंप पर हमला किया गया, जिसमें दो जवान शहीद हो गए। ऐसे में शांति की पहल करने का क्या कोई अर्थ रह भी जाता है?

सरकार को इस बारे में सिरे से विचार करना होगा। जिस तरह से ईद के दिन घाटी में पत्थरबाजी हुई, पाकिस्तान और आईएस के झंडे दिखाए गए; उससे इतना तो इल्म हो ही जाता है कि कश्मीर के चंद नापाक लोगों को न तो इंसानियत, कश्मीरियत और न जम्हूरियत पसंद है। उन्हें अब किस भाषा और बोली में समझाया जाए, इस पर संजीदगी से मंथन करने का वक्त आ गया है।

आंकड़े इस बात की तस्दीक करते हैं कि पाकिस्तान ने इस साल जून पहले हफ्ते तक 1000 से ज्यादा संघर्ष विराम का उल्लंघन किया है। उसे भारत की अमन बहाली के गंभीर प्रयासों की तनिक भी चिंता या सरोकार नहीं है। सूबे में शांति और अमन-चैन का माहौल हो, इसके लिए भारत की तरफ से अनगिनत कोशिशें हुई।

कभी विशेष दूत की नियुक्ति की गई तो कभी विशेष प्रतिनिधिमंडल ने राज्य का दौरा किया। तो कभी वहां के नौजवानों के कॅरियर के लिए सेना और सरकार ने कई योजनाएं चलाई। मगर नतीजा सिफर! तो आखिर यह जन्नत कब तक जहन्नुम बना रहेगा? क्या सख्ती ही यहां अमन की राह दिखाएगा या पूर्व में किए प्रयासों से इतर सरकार कुछ और नया सोचेगी?

इन 30 दिनों में पाकिस्तान और पाकिस्तान परस्त आतंकवादियों ने भारत की दयाशीलता का बेजा इस्तेमाल किया। सो, बिना वक्त गंवाये राज्य की तकदीर और तस्वीर बदल देने का दावा करने वाली केंद्र सरकार को अंतिम नतीजे तक पहुंचने का समाधान तलाशना होगा।