केदारनाथ: जीवन और मोक्ष का केंद्र

रीमा गौतम,

भगवान केदार छ: महीने की समाधि के बाद जगे हैं। दुनियाभर से केदारनाथ धाम पहुंच रहे भक्तों के मन में भोलेनाथ के दर्शन की अभिलाषा है। घाटी में प्रवेश करते ही कुछ तो है जो आपको रोमांच से भर देता है।

जहां भगवान रहते हैं वहां विश्वास कभी खत्म नहीं होता। इस बात को केदारनाथ धाम के वासियों ने जिया है। 2013 की महाभयंकर आपदा के बाद भी भोलेनाथ पर विश्वास बढ़ता जाता है। वही तो पालक है, वही तो संहारक है। बाबा केदार सब जानते हैं। ये विश्वास वहां के लोगों में चरम पर है। हमने भी प़ट खुलने के साथ ही बाबा के समाधि से जगने के बाद प्रथम दर्शन किये। जब बाबा पहले दिन बिना किसी साज श्रृंगार के प्रकट होते हैं। अद्भुत और आलौकिक होता है ये पल। मंदिर के ठीक पीछे दिव्य शिला (जिसे भीम शिला भी कहते हैं) को देखकर चमत्कार पर यकीन अवश्य हो जाता है। ये वही शिला है जो 2013 की आपदा में सैलाब के साथ आई और मंदिर के ठीक पीछे कुछ ऐसे आकर स्थापित हो गई जिससे सैलाब मुख्य मंदिर के दोनों तरफ से बह निकला। रुद्र के रौद्र रूप की कल्पना मात्र से मानव मस्तिष्क शिथिल होने लगता हैं। फिर इस दिव्य शिला को देखकर ये तो निश्चित होता हैं कि ईश्वर चाहे तो क्या नहीं हो सकता।

प्रांगण के सौंदर्यीकरण का कार्य दिन रात चल रहा है, जिसके चलते जल्द ही घाटी की तस्वीर बदल गई। विकास ने छूकर आपदा से ज़ख्मी केदार घाटी को नवजीवन दे दिया है। लेकिन गहराई से देखने और वहां के वासियों की आत्मीयता भरी बातचीत आपको परेशान करती है। पहले की अपेक्षा यात्री निवास और धर्मशालाओं की संख्या बेहद ही कम हो गई है। जो घर बचे हैं उनमें से भी कुछ को तोड़ा जाएगा। कईयों को मुआवज़ा अब तक नहीं मिला और जिन्हें मिला भी वो ये नहीं समझ पा रहे कि दशकों से जो अब तक घर था उसे छोड़ कर कहां जाएं। गरीबी, अशिक्षा की इबारत युवाओं के चेहरे पर छप चुकी हैं। 6 महीने कमाएंगे तो 6 महीने खाएंगे। लेकिन कमाएंगे क्या। यात्रा का पूरा समय ही इनकी जीविका का एक बड़ा साधन था। लेकिन अब ना दुकानें बसाने की अनुमति है। ना घर बनाने की। जाएं तो जाएं कहां?

बात अगर यात्रियों की सुविधाओं की करें तो ज्यादातर यात्री भगवान के दर्शन के बाद खुले प्रांगण में बैठे दिखे। टेंट की सुविधा मंदिर से लगभग 1 किमी. दूर है। दोपहर 2 बजे के बाद यहां ठिठुरन भरी हवाएं शुरू हो जाती हैं। ऐसे में यात्री इस व्यवस्था से असंतुष्ट दिखे। देर रात तक रहने के लिए कमरे तलाशते नज़र आये। पीने के पानी की व्यवस्था भी अपर्याप्त है। पहाड़ों में माल ऊपर पहुंचाना महंगा सौदा है। ज़ाहिर है हर चीज़ के लिए कीमत लगभग दोगुनी है। एसे में ज्यादातर यात्री परिवार के साथ परेशान नज़र आते हैं।

अब बात चिकित्सीय सुविधाओं की। यात्राकाल में लाखों श्रद्धालु बाबा केदार के दर्शनों के लिए पहुंचते हैं। गौरीकुंड में कुछ बुनियादी चिकित्सीय सुविधाओं के साथ अस् पताल हैं। लेकिन उसके बाद पूरे यात्रा मार्ग पर कोई भी चिकित्सीय सुविधा नहीं मिलती। रामबाड़ा के बाद तो पीने का पानी या कुछ खाने की सुविधा भी नहीं दिखती। 2013 की विभीषिका के बाद पुराना यात्रा मार्ग बंद कर दिया गया। नया मार्ग लगभग 19 किमी. का दुर्गम पहाड़ी रास्ता है। जो अभी आधे से ज्यादा बनकर तैयार होना है।यहां चिकित्सीय सुविधाएं और ज्यादा प्रमुख हो जाती हैं क्योंकि ज्यादातर यात्री घाटी के निम्न तापमान के आदी नहीं होते। भीषण ठंड और ऑक्सीजन की कमी कई बार जानलेवा साबित होती हैं, ऐसे में प्रशासन के इंतज़ाम नाकाफी लगते हैं। लेकिन भगवान के दर पर आप ऐसे लोगों से मिलते हैं जो वाकई में निष्काम जनसेवा की मिसाल पेश कर रहे हैं। उन्हीं में से हैं दिल्ली स्थित सिक्स सिग्मा हाई एल्टीट्यूड मेडिकल सर्विसेस के डॉ प्रदीप भारद्वाज और उनके साथ जुड़े देश के कई हिस्सों से डॉक्टरों की और वालिंटियर्स की टीम।

बेहद जोशीले, युवा चेहरे जो बस ये ठान कर विषम से विषम परिस्थियों में दो-दो महीने रहकर मुफ्त मेडिकल कैंप लगाते हैं ताकि ज्यादा से ज्यादा यात्रियों को मेडिकल सुविधा मिल सके। तमाम ज़रूरी दवाईयों, ऑक्सीजन सिलेंडर, माइनर सर्जरी तक के उपकरणों से लैस दिखी डॉ प्रदीप और उनकी सिक्स सिग्मा की टीम, जिन्होंने यात्रा के पहले दो दिनों में ही लगभर 300 लोगों को मेडिकल सुविधाएं दीं और 2 को गंभीर स्थिति में एयरलिफ्ट करवाया। ये सब सालों से चलता आ रहा है। सभी प्रमुख हाई एल्टीट्यूड की यात्राओं पर सिक्स सिग्मा बिना किसी भी वित्तीय सहायता के मुफ्त मेडिकल कैंप लगाती है और अब तक हज़ारों लोगों की जान बचा चुकी है। लेकिन निश्चित तौर पर प्रशासन पर ऐसे लोगों को आगे बढ़कर मदद देनी होगी क्योंकि जो हमने देखा, वो बेहद अपर्याप्त लगा। आखिरकार ये ज़िम्मेदारी पहले प्रशासन की ही है। जो अधिकतर वीवीआईपी मूवमेंट में व्यस्त रहता है। ऐसे मे सिक्स सिग्मा के जज़्बे को सलाम है।

केदारनाथ धाम सिर्फ चार धामों में प्रमुख ही नहीं बल्कि जीवन का केंद्र है। जीवन में रहकर मोक्ष की कामना और उसे भोलेनाथ को अर्पित करने का संकल्प जो हर बाधा को पार करके उन तक पहुंचने के लिए प्रेरित करता है। ऐसे में आखिरकार सब भूल कर सभी के मुख से यही निकलता है। ...हे महादेव! त्राहिमाम शरणागतम! हे! केदार पांडवों के बाद हम कलयुगियों का उद्धार कीजिए।