कूड़े पर फटकार

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गंदगी और पानी निकासी के मामले पर दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार को सर्वोच्च न्यायालय की डांट बेवजह नहीं है। हर साल जहां देश की राजधानी दिल्ली कूड़े से बजबजा रही होती है वहीं देश की आर्थिक राजधानी मुंबई भी बारिश के पानी की निकासी को लेकर ठहर सी जाती है।

न तो कभी यहां की सरकारों द्वारा इस घनघोर समस्या का कोई ठोस समाधान बताया जाता है न दलों के पास कूड़ा निस्तारण या ड्रेनेज प्रणाली को लेकर किसी तरह की संजीदगी झलकती है। इस ‘सालाना समस्या’ का कोई ठोस समाधान सुझाने के बजाय सभी राजनीतिक दल ब्लेम गेम करने में जुट जाती हैं। सर्वोच्च न्यायालय की तल्खी के पीछे यही एकमात्र वजह है।

अदालत इस बात को लेकर ज्यादा आक्रामक दिखी कि पूरा शहर कूड़े के ढेर पर बैठा है मगर न तो दिल्ली सरकार इस गंभीर मसले पर फिक्रमंद है और न केंद्र सरकार। सभी पक्ष हाथ-पर-हाथ धरे बैठे हैं और मजा ले रहे हैं। 2016 में भी सर्वोच्च अदालत ने दिल्ली सरकार पर गंदगी को लेकर आड़े हाथों लिया था। उस वक्त शीर्ष अदालत की टिप्पणी थी, ‘दूसरों को समस्या के लिए जिम्मेदार ठहराना दबंगई है।

साफ है अदालत जानती है कि जिम्मेदारी किसकी है? शहर को साफ-स्वच्छ रखने के वास्ते करोड़ों रुपये आवंटित होते हैं। मगर यह रकम कहां खर्च होती है, किसी को नहीं मालूम। मुबंई में बारिश के बाद शहर पंगु हो जाता है। लेकिन देश की सबसे अमीर नगरपालिका (बृहन मुबंई नगरपालिका) इस परेशानी का स्थायी हल अब तक नहीं ढूंढ सकी है।

तो फिर सरकार के होने का क्या मतलब? अगर करोड़ों खर्च करने के बावजूद जनता गंदगी में रहने को मजबूर है और सरकारें अपनी जिम्मेदारियां, कर्तव्य, दायित्व और जवाबदेही से बचती फिरे, तो अदालत को हस्तक्षेप करना ही पड़ेगा। और यही इस मर्तबा हुआ है।

केंद्र और राज्य सरकारों पर कचरा प्रबंधन में हीलाहवाली से दुखी होकर अदालत ने यहां तक कहा कि, जब व्यवस्था बुरी तरह फेल हो जाती है और कोर्ट दखल देता है तो उस पर न्यायिक सक्रियता के आरोप लगते हैं। उसे शक्ति बंटवारे का पाठ पढ़ाया जाता है। ऐसा आखिर कब तक चलेगा?

अगर दिल्ली-मुबंई सरीखे शहरों की स्थिति बारिश और कूड़े की वजह से चरमराने लगेगी तो यह अंदाजा लगाना ज्यादा कठिन नहीं कि बाकी शहरों के मंजर क्या होेंगे? लिहाजा दिल्ली सरकार, केंद्र और बाकी राज्य सरकारें अपनी जवाबदेही तय करें और जनता को बेहतर माहौल मुहैया कराएं।