कूड़े के बहाने सुप्रीम कोर्ट की एलजी को नसीहत, कहा- खुद भी काम करें और करने भी दें

सहारा न्यूज ब्यूरो, नई दिल्ली

दिल्ली की तीनों लैंडफिल साइट्स को लेकर ठोस नीति नहीं बनाने पर सुप्रीम कोर्ट ने उपराज्यपाल (एलजी) को फटकार लगाई। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एमसीडी एक्ट के तहत एलजी तीनों नगर निगम के मुखिया हैं, लेकिन वह सुपरमैन की तरह बर्ताव कर रहे हैं जबकि दिल्ली कचरे के पहाड़ में तब्दील हो रही है।
कचरे के एक पहाड़ की ऊंचाई हई कुतुबमीनार के बराबर : जस्टिस मदन लोकुर और दीपक गुप्ता की बेंच ने कहा कि इन कचरों के पहाड़ में से एक की ऊंचाई तो कुतुब मीनार के बराबर हो गई है। दिल्ली में हालात को विचित्र करार देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गाजीपुर, ओखला और भलस्वा में कचरों के पहाड़ का जिक्र किया और कहा कि गाजीपुर में तो 65 मीटर ऊंचा टीला बन चुका है जो कुतुब मीनार से सिर्फ आठ मीटर ही कम है।
इस मामले में सीएम को बीच में मत लाइए : अदालत ने जानना चाहा कि क्या उपराज्यपाल का कार्यालय जिम्मेदार है। आपके हलफनामे के अनुसार तो जवाब हां है। इसलिए इस मामले में मुख्यमंत्री को बीच में मत लाइए। अदालत ने कहा कि डम्पयार्ड काफी ऊंचे हो गए हैं और यह उपराज्यपाल कार्यालय की निष्क्रियता का संकेत देते हैं।  
एलजी ने 25 बैठकें कर के भी कुछ नहीं किया : अदालत ने यह टिप्पणी भी की कि इस मसले पर उपराज्यपाल द्वारा 25 बैठकें आयोजित करने के बावजूद कुछ नहीं हुआ है। कोई भी अनुमान लगा सकता है कि इन बैठकों में क्या चर्चा हुई होगी। अदालत ने कहा कि इन बैठकों के बावजूद दिल्ली में कचरे के पहाड़ हैं। बेंच ने कहा कि दिल्ली में ठोस कचरे के प्रबंधन के मामले में अधिक गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है।  
एलजी के पास प्राधिकारों को निर्देश देने का अधिकार : अदालत ने ठोस कचरा प्रबंधन के बारे में सरकार की नीति को आदर्शवादी बताया और कहा कि इसे लागू करना शायद असंभव हो क्योंकि पूर्वी दिल्ली नगर निगम और उत्तरी दिल्ली नगर निगम के पास अपना ही रोजाना का काम करने के लिए धन नहीं है। इस नीति को उपराज्यपाल कार्यालय ने तैयार किया है। अदालत ने उपराज्यपाल कार्यालय को 16 जुलाई तक हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया जिसमें इस स्थिति से निबटने के लिए उठाए जाने वाले कदमों का समयबद्ध कार्यक्रम शामिल हो।    
गुड़गांव के निगम आयुक्त की मदद लेने को उन्हें तलब किया : इस बीच, दक्षिण दिल्ली नगर निगम ने अदालत को बताया कि ओखला डम्पयार्ड पर कचरे की ऊंचाई पिछले आठ महीनों में करीब 10 मीटर कम हो गई है और अगले साल मार्च तक इसके सात मीटर और कम हो जाने की संभावना है।  इस मामले में न्याय मित्र की भूमिका निभा रहे वरिष्ठ अधिवक्ता कोलिन गोन्साल्विज ने नागपुर नगर निगम द्वारा ठोस कचरा प्रबंधन के मसले से निबटने के लिए उठाए गए कदमों का जिक्र करते हुए कहा कि गुड़गांव में भी यही प्रयास किए जा रहे हैं।  

कोर्ट क्यों हुआ नाराज
दरअसल एमिक्स क्यूरी कॉलिन गोंजाल्विस ने कहा कि मीटिंग में तय हुआ था कि रोज़ाना 2 बार सफाई होगी। सफाई के लिए ज़िम्मेदार अधिकारियों और स्वास्थ्य अधिकारियों के नाम वेब साइट पर होंगे। ज़िम्मेदारी तय हो। सज़ा का प्रावधान हो। मगर उपराज्यपाल सफाई से संबंधित मीटिंग में न खुद आए न ही नुमाइंदे को भेजा। कोर्ट बस इसी बात पर नाराज हो गया।

एलजी की कार्य प्रणाली पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने उपराज्यपाल के रवैये पर सवाल उठाया और कहा कि उनके कार्यालय के किसी भी अधिकारी ने ठोस कचरा प्रबंधन के मसले पर दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री की बैठक में शामिल होने की परवाह नहीं की और वह (उपराज्यपाल) कहते हैं कि मेरे पास अधिकार है और मैं सुपरमैन हूं। अदालत ने टिप्पणी की कि यह और कुछ नहीं बल्कि जिम्मेदारी को दूसरे पर थोपना है। मैं (उपराज्यपाल) ताकतवर आदमी हूं, कोई मुझे छू नहीं सकता और मैं करूंगा कुछ नहीं। उपराज्यपाल कार्यालय और दिल्ली सरकार द्वारा दाखिल हलफनामे का जिक्र करते हुए अदालत ने कहा कि दोनों ने ही कहा है कि दिल्ली में ठोस कचरा प्रबंधन का मसला नगर निगमों की जिम्मेदारी है और दिल्ली नगर निगम अधिनियम की धारा 487 के तहत इस बारे में निर्देश देने का अधिकार उपराज्यपाल के पास है।