किसके अम्बेडकर?

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अम्बेडकर भारतीय राजनीति और समाज में अनालोच्य हैं और देवता के रूप में प्रतिष्ठित हो गए हैं। दलितोत्थान अम्बेडकर की देन है। वह आजाद भारत की राजनीति के प्रतीक और पुरोधा बन चुके हैं। लिहाजा, इस प्रतीक का इस्तेमाल किये बिना दलित राजनीति हो ही नहीं सकती।

अर्थात् अम्बेडकर के बगैर कोई राजनीतिक दल जीवित ही नहीं रह सकता। इसलिए यदि दलितों को अपने साथ जोड़ कर रखना है तो अम्बेडकर को सम्मान देना होगा।

यही वजह है कि भाजपा जैसी सवर्ण हिन्दूवादी राजनीतिक पार्टी, जो राम और शिव की अराधना करने के बावजूद दलितों की अपनी तरफ आकषिर्त करने के लिए अम्बेडकर को देवत्व प्रदान करने के लिए विवश हैं। यह विवशता अन्य दलों के साथ भी है। इसलिए हर राजनीतिक दल अपने प्रतिद्वंद्वी दल के अम्बेडकर प्रेम को छद्म प्रेम बतलाता है और अपने आप को उनका सच्चा भक्त।

अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिये गए बदलावों के बाद दलितों के देशव्यापी आंदोलन से राजनीतिक दलों के बीच सबसे सच्चा अम्बेडकर भक्त होने की प्रतिस्पर्धा छिड़ी हुई है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दावा कर रहे हैं कि उनकी सरकार ने अम्बेडकर का सबसे अधिक सम्मान किया है, विपक्षी दल तो उनके नाम का महज सियासी इस्तेमाल किया है।

यह कम अचरज की बात नहीं है कि दलितों के मुद्दे पर परस्पर विरोधी विचार और नजरिया रखने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान दलितों को लुभाने के लिए एक दूसरे के नजदीक आ रहे हैं। चौदह अप्रैल को अम्बेडकर का जन्मदिवस है। इस अवसर पर दोनों नेता पटना में संयुक्त रैली निकाल रहे हैं। वहीं उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा की तैयारी जोरों पर है।

दरअसल, एससी/एसटी एक्ट को लेकर दलितों में भाजपा के विरुद्ध जो वातावरण बना है, उससे नीतीश और पासवान परेशान हैं। उन्हें दलितों के छिटक जाने का डर है। लेकिन सबसे अहम सवाल यह है कि अम्बेडकर तो सबके हैं,पर दलितों का कौन है?

सच तो यही है कि अम्बेडकर सर्वमान्य प्रतीक हैं, निर्विवाद हैं, लेकिन यह मान लेने से दलितों के वास्तविक मुद्दों का निराकरण हो जाएगा? दरअसल, प्रतीकों के सहारे राजनीति को साधने का यह दौर है। अलबत्ता, जातिविहिन सर्व समाज का निर्माण कैसे होगा, इस मुद्दे पर कोई बात नहीं करता।