किकी डांस : उफ ! ये आत्महंता चुनौतियां

अभिषेक कुमार सिंह,

जब से अकेले वीडियो, मोबाइल और इंटरनेट पर ऑनलाइन खेले जाने वाले गेम्स दुनिया में आए हैं, बच्चों-किशोरों से लेकर बड़े-बूढ़ों में भी इन्हें लेकर दीवानगी देखी जा रही है। दावा किया जाता है कि विभिन्न वजहों से इंटरनेट-मोबाइल से जुड़े अरबों लोगों में से दो-तिहाई लोग मोबाइल या वीडियो गेम्स खेलते हैं। मजेदार लगने वाले इन खेलों के खतरे बड़े हैं, यह पिछले साल कुख्यात हुए ऑनलाइन गेम-ब्लू व्हेल चैलेंज-के असर में आकर हुई आत्महत्याओं से साफ हो चुका है। इस बार किकी चैलेंज, मोमो व्हाट्सएप और ड्रैगन ब्रेथ चैलेंज का जलवा छा रहा है, ब्लू व्हेल जैसे खतरे उठ खड़े हुए हैं।
फिलहाल, ज्यादा चर्चा किकी चैलेंज की है, जिसमें एक कनाडाई गायक (रैपर) का गाना ‘किकी..डू यू लव मी’ गाते हुए चलती कार की अगली सीट से उतर कर डांस करना होता है, और चैलेंज पूरा करने के बाद नाचते हुए ही चलती गाड़ी में अंदर बैठना होता है। कुछ समय पहले शिगी नामक कॉमेडियन ने इस चैलेंज की शुरुआत की थी। देखते ही देखते दुनिया में इसका क्रेज छा गया। हमारे देश के युवाओं में भी यह चैलेंज स्वीकार करने की खबरें हैं। ड्रैगन ब्रेथ भी अलग किस्म का खतरनाक खेल है। चैलेंज स्वीकार करने वाले को लिक्विड नाइट्रोजन में डूबी हुई टॉफी (कैंडी) खाकर अपनी नाक से ड्रैगन की तरह धुआं निकालना होता है। शर्त है कि कैंडी पूरी खत्म होने तक मुंह नहीं खोला जा सकता अन्यथा चैलेंज टूटा माना जाएगा। लिक्विड नाइट्रोजन कितनी खतरनाक है, इसका पता पिछले साल दिल्ली में चल चुका है, जब लिक्विड नाइट्रोजन पेट में जाने से एक युवक की मौत हो गई थी। मोमो व्हाट्सएप तकरीबन ब्लू व्हेल गेम जैसा ही खतरनाक है।
इसमें चुनौती स्वीकार करने के कई चरण हैं।  पहला है एक अज्ञात नम्बर पर मैसेज भेजना। अगले चरणों में उस अनजान नम्बर पर बात करनी होती है, बात होने पर चैलेंज ले रहे व्यक्ति को फोन पर डरावनी तस्वीरें भेजी जाती हैं, और कई टास्क दिए जाते हैं, जिन्हें पूरा नहीं करने पर धमकाने की भी शिकायतें आई हैं। बताया जा रहा है कि कुछ अरसा पहले अज्रेटीना में 12 साल की एक बच्ची ने इस गेम के प्रभाव में आकर आत्महत्या कर ली। पुलिस के   मुताबिक बच्ची ने आत्महत्या से पहले अपने फोन में एक वीडियो रिकॉर्ड किया था। शक है कि उसे ऐसा करने को उकसाया गया और 18 साल के एक युवक की तलाश है, जो उस बच्ची के संपर्क में था। अनुमान है कि मोमो चैलेंज को पूरा करने के लिए बच्ची को अपना सुसाइड वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर करने को कहा गया था।
आभासी दुनिया के ये चैलेंज कितने खतरनाक हैं, इसका अंदाजा पिछले साल हुआ जब ब्लू व्हेल गेम के असर से हो रहीं घटनाओं के मद्देनजर 11 अगस्त, 2017 को भारत सरकार ने आईटी एक्ट के सेक्शन 79 के इस गेम को प्रतिबंधित कर दिया। अदालत ने इंटरनेट सर्च इंजनों से इस गेम से जुड़े सभी लिंक अपनी वेबसाइटों से हटाने को भी कहा था। आम तौर पर स्वीकार करना कठिन होता है कि मनोरंजन का खेल आत्महत्या के लिए भला कैसे प्रेरित कर सकता है? समाजशास्त्रियों का कहना है कि जब कोई मोबाइल या इंटरनेट गेम खेलते समय हमें आनंद की अनुभूति होती है, तो वह गेम हमारे दिमाग में उसे बार-बार खेलने के लिए प्रेरित करता है। ज्यादातर गेम्स में कई लेवल होते हैं, जो आसान से मुश्किल होते चले जाते हैं। अलग-अलग लेवल पर जो टास्क मिलते हैं, उनसे बच्चों और किशोरों में भावना पैदा होती है कि इससे भी मुश्किल काम करके दिखा सकते हैं। हालांकि कड़ी चुनौतियां मिलते चले जाने पर बच्चे अंदाजा नहीं लगा पाते कि उनकी आंखों, शरीर को क्या नुकसान हो रहा है, उनका कितना समय नष्ट हो रहा है। हर गेम आत्महत्या के लिए नहीं उकसाता लेकिन जब वे गेम खेलते हुए आभासी दुनिया और असली दुनिया का फर्क भूल जाते हैं, तो ऐसी स्थिति में खुद को या फिर दूसरों को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
अहम सवाल है कि क्या इन खेलों पर लगाई जाने वाली रोक समस्या का समाधान कर पाएगी? देखा गया कि जिन चीजों पर पाबंदी लगाई जाती है, उन्हें देखने-परखने का एक नया ही जज्बा पैदा हो जाता है। हालांकि यह भी सही है कि कुछ समय चर्चा में रहने के बाद ये जानलेवा खेल अपनी ही मौत मर जाते हैं, लेकिन अल्पावधि में ही जो नुकसान बच्चों और युवाओं को पहुंचा देते हैं, उसके मद्देनजर इन मामलों में निगरानी और सावधानी ही बचाव का सटीक उपाय है। समाज जितनी जल्दी मोबाइल और इंटरनेट पर असली और नकली का फर्क करना सीख लेगा, उतनी ही जल्दी हम इस मामले में राहत की उम्मीद कर सकते हैं।