कांग्रेस की सलाह

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यह बात सौ फीसद सही है कि अगले साल होने वाले लोक सभा चुनावों में कांग्रेस को शामिल किए बगैर भाजपा विरोधी किसी भी महागठबंधन का अखिल भारतीय स्वरूप उभर नहीं सकता। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद ने इस बात का इशारा किया है। इसी के साथ यह वास्तविकता है कि उत्तर प्रदेश और बिहार में कांग्रेस का जनाधार चुनाव दर चुनाव सिकुड़ता गया है।

ऐसे कि यह कहना समीचीन होगा कि इन दोनों प्रमुख हिन्दी भाषी राज्यों से कांग्रेस बाहर हो गई है। शायद यही वजह है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा विरोधी दो राजनीतिक शक्तियां-समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी-कांग्रेस को प्रदेश में कम सीटें दिए जाने या महागठबंधन से बाहर रखने पर विचार कर रही हैं। उधर, ममता बनर्जी की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाएं भी आसमान पर हैं।

पिछले कुछ दिनों से जिस तरह से उनकी राजनीतिक सक्रियता बढ़ी है, उससे यह सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि वह प्रधानमंत्री पद की दौड़ में शामिल होना चाहती हैं। इसमें किसी को आपत्ति भी नहीं होनी चाहिए क्योंकि सार्वजनिक जीवन में रहने वाला हर राजनीतिक व्यक्ति वहां पहुंचना चाहता है। लेकिन इसके लिए संविधान में उल्लिखित प्रावधानों को पूरा करना पड़ता है।

इस लिहाज से गैर-भाजपा दलों में कांग्रेस ही एकमात्र ऐसी पार्टी है, जिसका स्वरूप अखिल भारतीय है। इसका आशय यह है कि अभी भी लगभग हर सूबे में कांग्रेस की उपस्थिति है। यही वजह है कि गैर-भाजपा दलों में कांग्रेस ही एकमात्र ऐसी पार्टी है, जिसे लोक सभा की सबसे ज्यादा सीटें मिल सकती हैं, और भाजपा को राजनीतिक चुनौती भी कांग्रेस ही दे सकती है।

समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल और तृणमूल कांग्रेस का प्रभाव अपने-अपने राज्यों तक ही सीमित है। अलबत्ता, भाजपा को सत्ता से आने से रोकने के लिए कांग्रेस का नेतृत्व वाला गठबंधन ही प्रभावशाली हो सकता है। विपक्ष की रणनीति के लिहाज से बेहतर यही होगा कि चुनाव जीतने के बाद विपक्षी दल अपने प्रधानमंत्री का चुनाव करें।

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने राजनीतिक दूरदर्शिता दिखाते हुए इस और इशारा भी किया है। यह बात अन्य गैर-भाजपा दलों को भी समझना पड़ेगा। इस राह पर चलकर ही भाजपा विरोधी सशक्त महागठबंधन अस्तित्व में आ सकता है।