कर्नाटक का रण

,

दक्षिणी राज्य कर्नाटक में सियासी रण का ऐलान हो चुका है। 12 मई को इस कांग्रेस शासित राज्य का भविष्य तय हो जाएगा। यह चुनाव 2019 के लोक सभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा का राजनीतिक रसूख और भविष्य तय कर सकता है।

कर्नाटक के नतीजे इसी साल मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों पर भी प्रभाव डालेंगे। साफ तौर पर कहा जा सकता है कि कर्नाटक का चुनाव कई तथ्यों पर जमी धूल को साफ करेगा। मसलन; भाजपा की जीत साफ तौर पर इशारा करेगी कि मोदी मैजिक अभी बरकरार है और अगले आम चुनाव में उसकी स्थिति को जितना कमतर आंका जा रहा है, उसके उलट है।

वहीं कांग्रेस के लिए यहां का नतीजा पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी की दशा और दिशा को स्पष्ट तौर पर बताएगा। लगातार दूसरी बार सत्तासीन होने से नि:संदेह राहुल का कद पार्टी में मजबूत होगा। साथ ही 2019 में विपक्षी दलों की भाजपा के खिलाफ बन रही या बनने वाले मोच्रे में उनकी हैसियत भी दमदारी के साथ रहेगी।

2014 के बाद हुए सभी उपचुनाव हारने वाली भाजपा के लिए कर्नाटक का नतीजा उसे आत्मविश्वास के साथ बेहद आक्रामक तरीके से विपक्ष पर हमला करने का ताकत भी मुहैया कराएगा। एक-के-बाद एक सहयोगी दलों को खोते जाने से भाजपा और खुद अपराजेय समझे जाने वाले नरेन्द्र मोदी के लिए माकूल नहीं कहे जा सकते हैं।

लिहाजा, भाजपा और संघ के लिए इस दक्षिण राज्य पर कमल खिलाना असंभव को संभव करने के समान होगा। यही वजह है कि भाजपा ने पुराने सेनापति पूर्व मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा पर 75 वर्ष होने के बावजूद दांव खेला है। मगर सियासी ट्रिक्स में माहिर कांग्रेस नेता सिद्धारमैया के लिंगायत को अलग कर भाजपा के वोटबैंक में जबरदस्त सेंधमारी की है।

हालांकि भाजपा राज्य में भ्रष्टाचार, लचर कानून-व्यवस्था, भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या को चुनावी मुद्दा बनाकर कांग्रेस के खिलाफ माहौल बनाने की भरसक कोशिश में है। वैसे 234 विधानसभा सीटों का पार्टीवार आकलन करें तो भाजपा और कांग्रेस से इतर जनता दल (सेक्युलर) को हल्के में लेना दोनों पार्टियों के लिए खतरनाक साबित होगा।

इस पार्टी के 37 विधायक हैं और इस बात का अनुमान विश्लेषक लगा रहे हैं कि जेडी (एस) के पास सरकार बनाने की कुंजी आ सकती है। कुल मिलाकर दक्षिण के दुर्ग में एक बार फिर सेंध लगाने में कौन बाजी मारता है, इसका पता 15 मई को चल जाएगा।