कठुआ कांड : सीबीआई जांच जरूरी

अवधेश कुमार,

इस समय पूरे देश में उबाल है। वास्तव में जम्मू के कठुआ में एक आठ साल की बच्ची आसिफा के साथ बर्बरता की जो घटना सामने आई है, वह किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को अंदर से हिला देने वाली है। अभी तक जो कुछ सामने आया है, उसे सच मान लें तो इसकी तुलना यदि किसी घटना से की जा सकती है तो दिसमतबर 2012 में दिल्ली में हुई ‘निर्भया कांड’ से।

सामान्यत: जब भी ऐसी वीभत्स घटना कहीं घटती है तो पूरे देश में गुस्सा पैदा होता है और एक ही आवाज उठती है कि दोषियों को कड़ी सजा दी जाए। ऐसी प्रतिक्रिया बिल्कुल स्वाभाविक है। कठुआ मामले में पुलिस ने जो 15 पन्ने का आरोप पत्र दाखिल किया है, उससे गुस्सा और बढ़ा है। इसमें बच्ची को पकड़कर बंधक बनाए रखने, नशीली दवाएं खिलाने, लगातार रेप करने और फिर मार दिए जाने का जो विवरण है, वह एकदम जमे हुए खून में भी उबाल पैदा कर दश्वेता है। एक आठ साल की लड़की साथ ऐसा होने का विवरण हमारे सामने आएगा तो प्रतिक्रिया क्या और कैसी होगी? किंतु संपूर्ण जम्मू और कठुआ का माहौल देखिए तो अलग ही तस्वीर है। वहां जांच करने वाली पुलिस टीम के खिलाफ भी चारों ओर आक्रोश है। पूरा जम्मू शत-प्रतिशत बंद रहा है। जम्मू बार एसोसिएशन खुलकर आरोपितों के पक्ष में आ गया है। धरना-प्रदर्शन हो रहा है। लोग सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं। यानी तस्वीर दो है।

पुलिस के आरोप पत्र को स्वीकार कर लें तो ऐसा लगेगा कि जम्मू के लोग और पूरा बार एसोसिएशन बलात्कारियों के पक्ष में खड़ा है जो शर्मनाक है। जिस तरह वकीलों ने न्यायालय में आरोपपत्र पेश करने से रोकने की कोशिश की, उससे भी पहली नजर में क्षोभ पैदा होता है। किंतु विचार करने वाली बात है कि आखिर इतने लोग आरोपितों के पक्ष में क्यों खड़े हैं? दुनिया में ऐसा नहीं होता कि एक साथ इतनी बड़ी संख्या, जिसमें वकील समुदाय भी शामिल है और सभी पार्टयिों के नश्वेता भी, बलात्कारी और हत्यारे का खुलेआम साथ दश्वेते दिखें। जो प्रदर्शन हो रहे हैं, उसमें लगभग सभी पार्टयिों के नश्वेता शामिल होते हैं।

भाजपा के दो मंत्रियों ने क्या इसलिए इस्तीफा दे दिया कि मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने बलात्कारियों एवं हत्यारों को बचाने की इनकी मांग नहीं मानी? सामान्य सोच में यह तर्क गले नहीं उतरता कि ये दो मंत्री या अन्य पार्टयिों के नश्वेता अपराधियों को बचाना चाह रहे हैं। यदि कोई किसी अपराधी या अपराधियों के साथ हो तो भी सार्वजनिक रूप से इतना आक्रोश प्रकट हुए सामने नहीं आता। जाहिर है, इस पूरे कांड पर जो कुछ हमारे सामने लाया गया है, उससे जरा अलग नजरिए से भी विचार करने की जरूरत है। मृत बच्ची का कुचला हुआ शरीर यदि बरामद हुआ है तो इस बात की पुष्टि होती है कि उसके साथ कुछ लोगों ने अपराध किया है। जो हैं उन्हें कानून के कठघरे में खड़ा किया ही जाना चाहिए। इसे यदि कोई सांप्रदायिक रंग दश्वेता है तो वह निश्चय ही मनुष्य कहे जाने लायक नहीं है। किंतु, सजा तो वाकई उन्हीं को मिलनी चाहिए जो असली अपराधी हैं।

पुलिस के आरोप पत्र को यदि थोड़ी भी गहराई से देखें तो उसमें कई प्रश्न ऐसे पैदा होते हैं, जिनका उत्तर नहीं मिलता। इसी तरह उसमें कुछ ऐसी बातें भी हैं, जो सामान्य तौर पर गले नहीं उतर सकती। जिस शख्स सांझीराम को मुख्य आरोपित बनाया गया है, वह सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी है; स्थानीय मंदिर में सेवादार है। उसके बारे में कहा गया है वह अपने आसपास बक्करवाल समुदाय को बसते देखना नहीं चाहता था। इसलिए उसने ऐसी साजिश रची ताकि इसके डर से वो वहां से भाग जाएं। पुलिस ने पूरे अपराध का आधार इसी को बनाया है। क्या आपको लगता है कि वाकई ऐसा हो सकता है? किसी समुदाय के एक मासूम लड़की के साथ बर्बरता हो जाए और वह पूरा समुदाय वहां से चला जाए ऐसी कल्पना तो कोई मूर्ख ही कर सकता है। इसमें दो राय नहीं कि वहां बक्करवाल समुदाय को लेकर तनाव है। किंतु उसे इस अपराध का आधार बना देना आसानी से पचता नहीं। इसलिए इस पूरी पुलिस कथा का आधार ही प्रश्नों के घेरे में है। इसको साबित करना भी कठिन होगा।

आगे की कथा देखिए। सांझीराम पहले अपने नबालिग भतीजे को घोड़ा चराने वाली उस आठ वर्षीय लड़की का अपहरण और बलात्कार करने के लिए तैयार करता है। वह एक दोस्त को इसमें मिलाता है और दोनों मिलकर ऐसा कर भी दश्वेते हैं। दोनों उसे बेहोश कर उसी मंदिर में बंधक बना लाते हैं, जहां सांझीराम सेवादार है। उस मंदिर की जो तस्वीर आई है उसमें कोई अलग से कमरा नहीं है। उसकी खिड़कियों में केवल गिल्र है; कोई दरवाजा नहीं। उस मंदिर में कहां और कैसे लड़की को रखा गया होगा, इसका उत्तर नहीं मिलता। इसी तरह सांझीराम का भतीजा मुजफ्फरनगर में उनके बेटे को फोन करता है कि तुम भी आ जाओ यदि लड़की के साथ बलात्कार करना है।

वह मेरठ से सीधे वहां पहुंच भी जाता है और बार-बार बलात्कार करता है। सांझीराम भी उससे बलात्कार करता है। यानी एक व्यक्ति अपने बेटे से बलात्कार करवाता है, अपने भतीजे से बलात्कार करवाता है और स्वयं भी करता है। आप सोचिए, इस कथा पर आप यकीन कर सकते हैं? सांझीराम का बेटा मुजफ्फरनगर में जहां पढ़ता है; वहां का रिकॉर्ड बता रहा है कि जिस दिन उसके कठुआ में होने की बात आरोप पत्र में है उस दिन उसकी परीक्षा थी, जिसमें वह उपस्थित था। अब कुछ लोग कह रहे हैं कि उसकी जगह कोई और परीक्षा दे रहा था। आरोप पत्र में ऐसी और भी बातें हैं, जो तकरे, तथ्यों और व्यावहारिकताओं की कसौटी पर खरे नहीं उतरते। वैसे भी उतनी संख्या में लोग यदि सही न्याय की मांग कर रहे हैं तो केवल पुलिस टीम के आरोप पत्र के आधार पर उनकी अनसुनी कर देना उचित नहीं है।

यह भी तो संभव है कि जम्मू-कश्मीर में सांप्रदायिक आग भड़काने के लिए कुछ लोगों ने साजिशन बच्ची के साथ बलात्कार कर उसकी हत्या कर मंदिर से कुछ गज की दूरी पर शव फेंक दिया हो। इसलिए लोग यदि सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं तो उसे स्वीकारा जाना चाहिए। कुछ लोग इसे सांप्रदायिक रंग देकर आग भड़काने में भी लगे हैं। किंतु इतने व्यापक स्थानीय जन समुदाय की भावनाओं को नजरअंदाज करना तो न्याय का तकाजा नहीं है।