कच्चा तेल : वैकल्पिक नीति जरूरी

जयंतीलाल भंडारी,

हाल ही में 11 सितम्बर को अमेरिका में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और ट्रेड वॉर के खतरों के कारण डॉलर के मुकाबले रुपया 100 के स्तर तक पहुंच सकता है। ऐसे में भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें और बढ़ती हुई दिखाई दे सकती हैं।  इन दिनों जब देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतें अब तक के सर्वोच्च स्तर पर पहुंच गई हैं, और वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें कम होने की संभावनाएं कम हैं, तो भारत के लिए पेट्रोल-डीजल के विकल्पों की नई रणनीति देश की अर्थव्यवस्था और आम आदमी को महंगाई से बचाने के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण जरूरत है।
निस्संदेह भारत के सामने कच्चे तेल की बढ़ी हुई कीमत संबंधी चिंता बनी हुई है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) ने कहा है कि 2018 में कच्चे तेल के दाम और बढ़ने के आसार हैं। दुनिया भर में भू-राजनीतिक परिस्थितियों के कारण ऐसा होने की संभावना है। इनमें ईरान पर प्रतिबंध और वेनेजुएला के तेल उत्पादन में गिरावट भी शामिल हैं। अगर पेट्रोलियम निर्यात करने वाले देशों का संगठन (अपेक) उत्पादन में बड़े इजाफे का संकेत नहीं देता है, तो कीमतें और बढ़ सकती हैं। इस साल और अगले साल तेल की मांग में काफी मजबूत इजाफा नजर आ रहा है, जो करीब 15 लाख बैरल प्रति दिन है। यह ऐतिहासिक रूप में औसत से बहुत ज्यादा है। दुनिया की ख्यात क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज ने कहा है कि अमेरिका और चीन के बीच छिड़े व्यापार युद्ध, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल के बढ़ते दाम और रुपये की कीमत में ऐतिहासिक गिरावट से अब पेट्रोल और डीजल में आ रही तेजी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
विश्व बैंक ने भी अपनी नवीनतम रिपोर्ट 2018 में कहा है कि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें भारत की अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का सबब बन रही हैं। हाल ही में दुनिया के ख्यातिप्राप्त निवेश बैंकों-बैंक ऑफ अमेरिका, मेरिल लिंच, मार्गन स्टेनली और ग्लोबल ब्रोकरेज फर्म सीएलएसए ने अपनी रिपोटरे में कहा है कि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से भारत में महंगाई बढ़ेगी, उपभोक्ताओं की परेशानियां और अर्थव्यवस्था की मुश्किलें बढ़ेंगी। निश्चित रूप से भारत द्वारा अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कच्चे तेल की कीमतों में मौजूदा बढ़े हुए स्तर से होने वाली मुश्किलों के मद्देनजर एक ओर तेल कीमतों पर उपयुक्त नियंत्रण तथा दूसरी ओर तेल के अन्य विकल्पों की रणनीति पर आगे बढ़ना होगा। निश्चित रूप से दुनिया के तीन में से दो सबसे बड़े तेल उपभोक्ता देश चीन और भारत हाथ मिला कर तेल उत्पादक देशों पर कच्चे तेल की कीमत वाजिब किए जाने का दबाव बनाने हेतु संयुक्त रणनीति को अंतिम रूप दे सकते हैं। ज्ञातव्य है कि एशियाई देशों के लिए तेल आपूर्तियां दुबई या अमान के कच्चे तेल बाजारों से संबंधित होती हैं, परिणामस्वरूप कच्चे तेल की कीमतें अपेक्षाकृत अधिक ली जाती हैं।  
कच्चे तेल की खरीदी में यूरोप और उत्तरी अमेरिका के देशों की तुलना में एशियाई देशों को कुछ अधिक कीमत चुकानी पड़ती है, जिसे एशियाई प्रीमियम नाम दिया गया है। एशियाई प्रीमियम अमेरिका या यूरोपीय देशों की तुलना में प्रति बैरल करीब छह डॉलर अधिक है। चीन और भारत दुनिया में बड़े तेल आयातक देश हैं। अतएव उनसे कई एशियाई प्रीमियम वसूल करने की बजाए उन्हें बड़ी मात्रा में तेल खरीदी का विशेष डिस्काउंट दिया जाए। भारत तेजी से विकास कर रहा है, और 2030 तक आने वाले वर्षो के दौरान देश की ऊर्जा संबंधी मांग बहुत तेजी से बढ़ेगी। इस अवधि में यह मांग दुनिया के किसी भी अन्य देश की तुलना में तेज होगी। कच्चे तेल के आयात पर इसकी निर्भरता में भी इजाफा होगा। ऐसे में आवश्यकता इस बात की होगी कि सरकार एक एकीकृत ऊर्जा नीति तैयार करे। सरकार द्वारा बिजली से चलने वाले वाहनों पर काफी जोर देना होगा। इलेक्ट्रिक कारों को  टैक्स कम करके बढ़ावा देना होगा। केंद्र  सरकार द्वारा जून, 2018 में नीति आयोग द्वारा दिए गए उस महत्त्वपूर्ण सुझाव पर गौर किया जाना होगा जिसमें कहा गया है कि राज्य परिवहन निगमों को लक्ष्य दिया जाना होगा कि वे अपने परिवहन बेड़े में एक निश्चित प्रतिशत में इलेक्ट्रिक वाहन शामिल करें। सरकार द्वारा इलेक्ट्रिक कार और गैस से संचालित होने वाले वाहनों को प्रोत्साहन देना होगा। इसके साथ-साथ केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा सार्वजनिक परिवहन सुविधा को सरल और कारगर बनाया जाना होगा। इसके लिए परिवहन सुविधाओं में उपयोगकर्ता की सहूलियत बढ़ाने वाला नजरिया रखना होगा। कारों की बढ़ती संख्या को नियंत्रित करना होगा। शहरी यातायात के लिए सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को कारगर बनाना होगा।
पेट्रोल और डीजल के बढ़ते उपभोग से बचने के लिए हाल ही में 3 सितम्बर को नीति आयोग ने सार्वजनिक परिवहन की नई रणनीति पेश करने की जो बात कही है, उसे शीघ्रतापूर्वक प्रस्तुत करना होगा। नीति आयोग ने कहा है कि सार्वजनिक परिवहन की आवश्यकता बढ़ती जा रही है। भारत में जल्द ही लंदन, सिंगापुर और अन्य अंतरराष्ट्रीय महानगरों की तर्ज पर सार्वजनिक परिवहन के विभिन्न साधनों के लिए एक परिवहन कार्ड की नीति पेश की जाएगी। इस कार्ड से देश भर में कहीं भी सार्वजनिक परिवहन के विभिन्न साधनों से यात्रा की जा सकेगी। सार्वजनिक परिवहन के लिए इलेक्ट्रिक, एथेनॉल, मेथेनॉल, सीएनजी और हाइड्रोजन ईधन सेल जैसे परिवहन के प्रदूषणरहित साधन उपयोग में लाए जाने से प्रदूषण में कमी लाई जा सकेगी तथा पेट्रोल और डीजल की तेजी से बढ़ती हुई मांग में भी कमी आएगी। पेट्रोल-डीजल की मांग घटाने और इनके विकल्प तैयार करने के लिए कई कारगर प्रयास प्राथमिकता से करने होंगे। रेलवे में डीजल की खपत घटने के लिए विद्युतीकरण पर जोर देना होगा। भारत में मुंबई ऑफशेर और कृष्णा गोदावरी बेसिन सहित अन्य स्थानों पर जिन 42 अरब टन तेल भंडारों की खोज हुई है, उनके दोहन को प्राथमिकता से गति देनी होगी। जैव ईधन का उपयोग बढ़ाना होगा। अभी पेट्रोल और डीजल में 10 फीसदी एथनॉल का मिशण्रकिया जाता है। 2030 तक इसे बढ़ाकर 20 फीसदी किए जाने का जो लक्ष्य रखा गया है, उसकी दिशा में तेज कदम उठाए जाने होंगे। इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने वाली सरकारी योजना फेम के दूसरे चरण की सफलता के लिए उपयुक्त कदम जरूरी होंगे ताकि इलेक्ट्रिक वाहनों का अधिक उपयोग हो सके। इन सभी रणनीतिक प्रयासों से अर्थव्यवस्था कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के खतरों का सामना कर सकेगी और विकास की डगर पर आगे बढ़ती रहेगी।