कई रंग बाकी

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कर्नाटक की राजनीति के दूसरे दृश्य का भी पटाक्षेप हो गया। पहला दृश्य चुनाव परिणाम के साथ खत्म हुआ था, जिसमें भाजपा सबसे बड़ा दल होते हुए भी बहुमत से वंचित रह गई थी। दूसरा बी. एस. येदियुरप्पा का बिना शक्ति परीक्षण के विधानसभा में इस्तीफे की घोषणा थी। उनके इस्तीफे के साथ ही जनता दल-एस और कांग्रेस की मिलीजुली सरकार का रास्ता साफ हो गया। तो यह कनार्टक की राजनीति का तीसरा दृश्य होगा। यह देखना होगा कि तीसरा अंक कितना लंबा खींचता है। कहीं भी बहुमतविहीनता का चुनाव परिणाम आता है, सरकार का गठन कठिन हो जाता है।

हमारे यहां राजनीति में इतनी सहनशीलता, नैतिकता या विवेक शेष नहीं है कि प्रदेश या देश के हित में आवश्यक हो तो चुनाव के दौरान की कटुता को भूलकर किसी अल्पमत सरकार को चलने दें। 1991 में नरसिंह राव की सरकार 232 सांसदों के साथ करीब दो वर्ष तक चल गई थी। किंतु उसके बाद उसे भी विश्वास मत के लिए मजबूर किया गया।

किंतु अब तो राजनीतिक प्रतिस्पर्धा इतनी तीखी है कि वह राजनीतिक दुश्मनी में बदल गई है। हालांकि सत्ता पाने के लक्ष्य से ऐसी दुश्मनी कुछ समय के लिए नेपथ्य में चली जाती है और मंच पर घनघोर प्रेम का दृश्य उपस्थिति होता है, जैसा कर्नाटक में कांग्रेस और जद-एस के बीच हुआ है। उनके साथ आने के पीछे सत्ता के अलावा और कोई कारक नहीं हो सकता है। यह बात अलग है कि इसी जद-एस ने भाजपा के सहयोग से सरकार चलाई थी। हमारे देश में सत्ता के लिए ऐसी सुविधाओं का सिद्धांत और सेक्युलरवादी जमावड़ा जनता इतनी बार देख चुकी है कि इससे वितृष्णा होने लगी है।

किंतु संविधान में इसे रोकने का कोई प्रावधान नहीं है। संविधान केवल सदन के अंदर उपस्थित सदस्यों के बहुमत का प्रावधान करता है। यह तो नहीं कहा जा सकता जैसा भाजपा दावा कर रही है कि उसने विधायकों को अपने पाले में लाने की कोशिश नहीं की। शायद इसमें वह सफल नहीं रही। अगर दूसरी ओर भी सत्ता की संभावना हो तो आसानी से कोई पाला नहीं बदलता।

किंतु इसमें किसी तरह की दलीय या सैद्धांतिक निष्ठा देखना हास्यास्पद है। सत्ता का अंग न होने के बाद यदि विधायकी बची रहने या दोबारा से प्राप्त होने की संभावना हो तो कभी भी खेमा बदलने की गुंजाइश बनी रहती है। इसलिए कर्नाटक की राजनीति में अभी हमें कई दृश्य देखने को मिल सकते हैं। काश, कर्नाटक के मतदाताओं ने किसी दल को बहुमत दिया होता!