एससीओ में भारत

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चीन के किंगदाओं में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के शिखर सम्मेलन में आतंकवाद पर पारित प्रस्ताव और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा बिना नाम लिये चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) का विरोध भारत के लिए काफी महत्त्वपूर्ण है। मोदी की अपील पर पहली बार किसी बड़े क्षेत्रीय समूह में वैिक आतंकवाद निरोधक मोर्चा बनाने पर सहमति हुई है। घोषणा पत्र को देखें तो किसी आतंकवादी संगठन या देश का नाम नहीं लिया गया है, लेकिन साफ कहा गया है कि कार्रवाई के दौरान किसी तरह की राजनीति और दोहरा मानदंड नहीं होना चाहिए।

यह भी कहा गया है कि ऐसे आतंकवादी सबसे बड़ा खतरा हैं, जो दूसरे देशों में जाकर वारदात को अंजाम देकर लौट आते हैं, या जिन्हें किसी तीसरे देश में पनाह दे दी जाती है ताकि वे उस देश के भीतर आतंकवादी गतिविधियों को जारी रख सकें। यह पंक्ति पाकिस्तान के अलावा किसी देश के लिए नहीं हो सकती। इसी तरह दोहरा मानदंड चीन की ओर लक्षित हो सकता है, जो मसूद अजहर के मामले में वीटो करता रहा है। हालांकि व्यवहार में इस घोषणा का कितना पालन होता है, यह अभी देखने की जरूरत है। बीआरआई का सभी सदस्यों द्वारा समर्थन के बावजूद प्रधानमंत्री ने इससे इनकार किया।

साफ कहा कि संपर्क (कनेक्टिविटी) परियोजनाएं भारत की प्राथमिकता हैं, लेकिन ऐसे कार्यक्रमों में किसी भी देश की संप्रभुता एवं क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करना चाहिए। कनेक्टिविटी का मतलब केवल भौतिक संपर्क नहीं बल्कि यह लोगों से लोगों का संपर्क है। चीन के इस कार्यक्रम का जुड़ाव चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे से है, जो ग्वादर बंदरगाह को चीन के शिंकियांग प्रांत से जोड़ता है। चूंकि यह पाक अधिकृत कश्मीर से होकर गुजरता है जो कि भारत का अभिन्न हिस्सा है, इसलिए भारत इसका विरोध करता है। भारत का यह विरोध उचित है।

हालांकि चीन इसमें परिवर्तन को तैयार नहीं, पर यह अच्छा हुआ कि चीन की भूमि पर उसके और पाकिस्तान के राष्ट्रपति के सामने भारत ने अपना मत साफ कर दिया। देखना होगा एससीओ के दूसरे देश भविष्य में इसके प्रति क्या नीति बनाते हैं, पर हमें अपने रुख पर कायम रहना है। भारत की नीति साफ है। वह किसी भी कनेक्टिविटी परियोजना में शामिल हो सकता है, लेकिन वह समावेशी, पारदर्शी, स्थायी और देशों की अखंडता का सम्मान करने वाली हो। बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव ऐसी नहीं है।