एनपीए यूपीए की देन

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भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन द्वारा बैंकों के एनपीए यानी फंसे हुए कर्ज के संबंध में दिया गए बयान का कोई राजनीतिक निहितार्थ नहीं हो सकता। इसलिए उनके बयान को कड़वा सच मानना होगा। वैसे भी उन्होंने संसद की प्राक्कलन समिति को अपना लिखिल बयान भेजा है इसलिए उसकी सच्चाई पर कोई प्रश्न भी नहीं उठाया जा सकता है।

इससे कांग्रेस और यूपीए के घटक कठघरे में खड़े हो गए हैं। हालांकि अर्थव्यवस्था और बैंकिंग व्यवस्था पर नजर रखने वालों के लिए इसमें नया कुछ भी नहीं है। राजन के कहने से उन सारी बातों की पुष्टि हो जाती है जो एनपीए के संदर्भ में कही जा रहीं थी। एनपीए के बोझ से हमारी बैंकिंग व्यवस्था चरमरा रही है और नरेन्द्र मोदी सरकार को उन्हें बचाने के लिए मोटी रकम लगानी पड़ रही है उसकी जड़ यूपीए के शासनकाल में ही निहित है। राजन ने अपने कार्यकाल में एनपीए का पता लगाने और सामने लाने में बड़ी भूमिका निभाई थी। उनका कहना है कि यूपीए के पहले कार्यकाल में पहले बड़े बैंकों ने आंख मूंदकर आधारभूत संरचना के नाम पर नियोजित परियोजनाओं को कर्ज दिया।

उनकी देखा-देखी छोटे बैंकों ने देना शुरू कर दिया। परियोजनाओं की जांच तक नहीं की गई। वो परियोजनाएं उस रूप में जमीन पर नहीं उतरीं जैसी अपेक्षा थी और फिर कर्ज वापस मुश्किल हो गया। बैंकों ने कर्ज निकालने के लिए कंपनियों को और कर्ज दिए और यह बढ़ता चला गया। उनका मानना है कि बैंक अधिकारियों के अति उत्साह, सरकार की निर्णय लेने की प्रक्रिया में सुस्ती और आर्थिक वृद्धि दर में नरमी डूबे कर्ज के बढ़ने की प्रमुख वजह है।

बैंकों का उत्साह तो साफ दिखता है किंतु इसका कारण क्या हो सकता है यह जानने की जरूरत है। क्या सरकार की ओर से बैंकों को इसके लिए संकेत दिए जाते थे? बैंक अपनी जोखिम इतने सारे कर्ज दे देंगे यह सामान्य समझ से परे है। इसमें बैंक अधिकारियों का भ्रष्टाचार भी होगा। आरोप यह भी है कि बैंक अधिकारियों द्वारा कर्ज की याद दिलाए जाने पर उन्हें धमकी तक मिलती थी।

ऐसा वातावरण क्यों बन गया था इसकी तो जांच होनी चाहिए। कांग्रेस के यह कहने से उसका दोष कम नहीं हो जाता कि हम जब गए तो एनपीए केवल दो लाख करोड़ था और आज नौ लाख करोड़ हो गया। यह इसलिए हो गया कि वर्तमान सरकार ने पूरे एनपीए को सामने लाने की कोशिश की है ताकि बैंकिंग प्रणाली की स्थिति समझी जा सके।